उठ, देख सूरज की किरणों को है तेरा इंतज़ार।
क्यूँ, डर रहा है तू उनका सामना करने से?
क्यूँ खो रहा है तू अपनी मंज़िल,
और भटक रहा है तू इस अँधेरे में?
किरणों का कर इस्तक़बाल,
क्यूँकि दुनिया को है तेरा इंतज़ार।
वह रो रही है मिलने की आस में,
क्यूँ दूर खड़ा है उससे?
आखिर क्या चाह है तेरी?
क्यूँ चल रहा है
इन गुमराह रस्तों पर?
ये गुमराहियाँ ही हसेंगी तुझ पे,
जब होगी वह तुझसे दूर।
उठ, लड़, झगड़ इन सारी परेशानियों से।
अभी भी वह नहीं है तुझसे दूर,
आज भी है उसे तेरा इंतज़ार।
छोड़ दे इन सारी फ़रेबखुशियों को,
जा हासिल कर अपनी ज़िन्दगी तू।
देख की सारी खुशियों को है तेरा इंतज़ार।
( शाहिद इकबाल टीम जीवन मैग की उर्दू विभाग के समन्वयक सदस्य हैं। आप जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली में ग्यारहवीं विज्ञान के छात्र हैं और पश्चिमी चंपारण, बिहार से ताल्लुक रखते हैं।)
क्यूँ, डर रहा है तू उनका सामना करने से?
क्यूँ खो रहा है तू अपनी मंज़िल,
और भटक रहा है तू इस अँधेरे में?
किरणों का कर इस्तक़बाल,
क्यूँकि दुनिया को है तेरा इंतज़ार।
वह रो रही है मिलने की आस में,
क्यूँ दूर खड़ा है उससे?
आखिर क्या चाह है तेरी?
क्यूँ चल रहा है
इन गुमराह रस्तों पर?
ये गुमराहियाँ ही हसेंगी तुझ पे,
जब होगी वह तुझसे दूर।
उठ, लड़, झगड़ इन सारी परेशानियों से।
अभी भी वह नहीं है तुझसे दूर,
आज भी है उसे तेरा इंतज़ार।
छोड़ दे इन सारी फ़रेबखुशियों को,
जा हासिल कर अपनी ज़िन्दगी तू।
देख की सारी खुशियों को है तेरा इंतज़ार।
( शाहिद इकबाल टीम जीवन मैग की उर्दू विभाग के समन्वयक सदस्य हैं। आप जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली में ग्यारहवीं विज्ञान के छात्र हैं और पश्चिमी चंपारण, बिहार से ताल्लुक रखते हैं।)
जीवन मैग जनवरी 2014 अंक से उद्धृत- मूल अंक यहाँ से डाउनलोड करें - https://ia600505.us.archive.org/7/items/JeevanMag4/Jeevan%20Mag%204.pdf
