JeevanMag.com

About Us

कथा‍-कहानी

यह भी जानो!

अनमोल वचन

From JeevanMag.com

Showing posts with label Current. Show all posts
Showing posts with label Current. Show all posts

Monday, 6 March 2017

अमेरिका में नस्लीय हिंसा सुनियोजित तो नहीं? -अबुज़ैद अंसारी

हाल ही में नस्लीय भेदभाव के कारण अमेरिका में भारतीयों पर हुए हमले में श्रीनिवासन नामक भारतीय ने अपनी जान गवां दी थी। इस घटना के बाद से वहां रह रहे भारतीयों में भय और तनाव का माहौल बना हुआ है। इस घटना के कुछ ही समय बाद न्यूयॉर्क की एक ट्रेन में एकता देसाई नामक भारतीय लड़की से बदसुलूकी का मामला सामने आया।  वहां रह रहे भारतीय समुदाय के लोग अभी श्रीनिवासन की हत्या के दर्द से बाहर भी नहीं आ पाए थे कि अमेरिका में कई दशकों से रह रहे हर्निश पटेल नामक व्यापारी की उसके घर में ही हत्या कर दी गई, और इस घटना के बाद एक सिख व्यक्ति को गोली मारी गई जिसमे हमलावर ने घटना को अंजाम देते हुए कहा कि "मेरे देश से निकल जाओ" हर्निश पटेल की हत्या के पीछे क्या कारण हो सकते हैं यह स्पष्ट नहीं है मगर इसमें नस्लीय हिंसा का अंदेशा हो सकता है। अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में होने वाली ऐसी घटनाएं अमेरिका और भारत दोनों के मध्य कुछ बड़े सवालों को जन्म देती हैं। जिनका संतुष्टिपूर्ण उत्तर मिल पाना लगभग मुश्किल है। उदाहरण के लिए बहुत लंबे समय से अमेरिका में रह रहे इन सीधे साधे भारतीयों पर जिनसे किसी अमेरिकी को किसी प्रकार का खतरा नहीं हो सकता। उन पर अचानक से इस प्रकार जानलेवा हमले कैसे होने लगे? यह सीधे साधे भारतीय लोग संघर्ष कर के भारत से अमेरिका जाते हैं और वहाँ मेहनत से काम करते हैं और अमेरिका की तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस बात का अंदाज़ा इससे ही लगाया जा सकता है कि वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को अमेरिका भेजने वाले एशियाई देशों में भारत शीर्ष पर है। 2003 से 2013 तक इस संख्या में 85 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के लिए अमेरिका जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 24.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दुनियाभर में 80 प्रतिशत से अधिक प्रवासी दस देशों में हैं जिनमे से 20 प्रतिशत सिर्फ़ अमेरिका में हैं। इनमे भारतीय प्रवासियों की संख्या अधिक है जैसा कि आंकड़ो से स्पष्ट है।

Photo credit: Andhrawishesh.com

हाल ही में अप्रवासी भारतीयों पर होने वाले हमलों को ट्रम्प की कट्टर नीतियों के प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। राष्ट्रपति  बनने से पहले चुनाव अभियान में ट्रम्प ने ऐसे कुछ विवादित बयान दिए थे जिसका प्रभाव अब वहाँ रह रहे आप्रवासियों पर साफ़ देखने को मिल रहा है। मगर आश्चर्य होने के साथ साथ यह बड़ा अजीब लगता है जब कुछ लोग इस इस नस्लीय हिंसा के पीछे पूर्ण रूप से ट्रम्प की कट्टर नीतियों को ज़िम्मेदार मानते हैं और फिर ट्रम्प ही इसकी निंदा करते हैं।  एक आशंका यह भी है कि अमेरिका में बसे भारतीयों को निशाना बनाने के लिए उन पर लगातार हो रहे इस प्रकार के हिंसक हमले पूर्णरूप से सुनियोजित हो जिस पर नस्लीय हिंसा का मुखौटा लगाया जा रहा हो। अगर ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि भारत और भारतीयों से नफ़रत करने वाले लोग अमेरिका में भारतीयों को पनपता हुआ नहीं देखना चाहते हैं। मगर एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर ऐसा है तो फिर यह हमले हाल-फिलहाल में क्यों तेज़ हुए, पहले क्यों नहीं? तो इसका सामान्य सा जवाब लोग यही देते हैं कि यह सब ट्रम्प के आने से हो रहा है। हम इन नस्लीय हिंसक हमलों के पीछे ट्रम्प को या उनकी नीतियों को पूर्णरूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते, कभी कभी नफ़रत फैलाने वाले लोग दूसरों की नीतियों की आँड़ में छिपकर उसका दुरुपयोग करते हैं।  आप्रवासियों पर हुए हमलों से सम्बंधित एफबीआई के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पिछले पांच साल में आप्रवासियों पर सबसे अधिक हमले वाशिंगटन डीसी में हुए हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यहाँ रहने वाले कुल आप्रवासियों में भारतीयों का प्रतिशत बहुत कम है। एफबीआई के आंकड़ों के अलावा अगर यूएस सेन्सस ब्यूरो स्टेटिक्स के 2003 से 2013 के आंकड़ों पर दृष्टि डाले तो कैलिफोर्निया में 19 प्रतिशत, न्यूजेर्सी में 11 प्रतिशत, टेक्सास में नौ प्रतिशत के हिसाब से आप्रवासी भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है। अमेरिका के अन्य राज्यों की तुलना में वाशिंगटन, न्यूजेर्सी, कैलिफोर्निया में भारतीयों के ख़िलाफ़ नस्लीय हिंसा की घटनाएं अधिक होती हैं।

मूल अमेरिकी जनसँख्या का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो इस प्रकार की हिंसा का विरोध करता है। ऐसे लोग अमेरिका में बसे आप्रवासियों के लिए उदारवादी दृष्टिकोण तो रखते ही हैं साथ ही प्रतिकूल परिस्थितियों में उनके लिए आवाज़ उठाने से भी पीछे नहीं हटते। वहाँ रह रहे भारतीय समुदाय के लोग इतने सशक्त हैं जो अपने लिए आवाज़ उठाने में सक्षम हैं। नस्लीय हिंसा जैसी संवेदनशील परिस्थितियों में आप्रवासी भारतीयों के लिए इन उदारवादी अमेरिकी नागरिकों का साथ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस सन्दर्भ में इयान ग्रिलोट सबसे अच्छा उदाहरण हैं जो श्रीनिवासन की जान बचाते समय घायल हो गए थे। मगर अफ़सोस तब होता है जब अमेरिका में कुछ संस्थाएं आप्रवासियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाती हैं और उनका एकमात्र उद्देश्य नफरत और हिंसा फैलाना है। फेडरेशन फॉर अमेरिकन इमिग्रेंट्स रिफार्म (फेयर) एक ऐसी ही संस्था है। अमेरिकी सरकार को ऐसी संस्थाओं पर तत्काल रोक लगाने की ज़रुरत है क्योंकि इस प्रकार की संस्थाए अमेरिका को अंदर से खोखला करने के सिवा कुछ नहीं करती। नस्लीय हिंसा पर राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा की गई निंदा को गंभीर रूप से एक चेतावनी के रूप में देखने की ज़रुरत है। अब देखना यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा की गई निंदा के बाद भी नस्लीय हिंसा की वारदातों में कुछ कमी आएगी या नहीं, अगर इन वारदातों में कमी नहीं आती है तो "अमेरिका फर्स्ट" की बात करने वाले ट्रम्प के लिए नस्लीय हिंसा के खिलाफ जाकर आप्रवासियों के पक्ष में कड़े फैसले लेना परीक्षा की घड़ी होगी।  

Abuzaid Ansari
अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक होने के साथ-साथ भारतीय विज्ञान कांग्रेस (कोलकाता), और  नेशनल एसोसिएशन फॉर मीडिया लिटरेसी एजुकेशन (न्यूयॉर्क) के सदस्य हैं। और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं।





Tuesday, 8 November 2016

नोट में बदलाव क्यों? -अबुज़ैद अंसारी


देश में एक हज़ार और पांच सौ के नोट में बड़ा बदलाव करके भारत सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने के लिए महत्वपूर्ण क़दम उठाया है। हर देश की सरकार यही चाहती है कि उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाये इसलिए सरकार का यह निर्णय इस दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। मगर भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले छठे दशक में मोरारजी देसाई जब वित्तमंत्री थे तब भी तत्काल सरकार ने कुछ इसी प्रकार के निर्णय लिए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस निर्णय के सकारात्मक पहलुओं को गिनाते हुए देश भर में इसे लागू कर दिया मगर यह फैसला जिस अंदाज में लिया गया उसने देश की जनता के समक्ष बहुत सारे प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इस देश का हर नागरिक यहाँ की अर्थव्यवस्था से प्रभावित होता है। और यहाँ की अर्थव्यवस्था देश के हर नागरिक से प्रभावित होती है। इसी कारण यह अपने आप में बहुत अजीब बात है कि ऐसा महत्वपूर्ण निर्णय जो अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ हो और जिसका प्रभाव व्यापक रूप से लोगों पर पड़ने वाला हो, अचानक और इतनी जल्दबाज़ी में कैसे लिया जा सकता है? यह तो बहुत जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय प्रतीत होता है। जिसकी कोई तैयारी नज़र नहीं आती, अगर सरकार इसके लिए तैयार भी है तो देश की जनता बिल्कुल भी तैयार नहीं है। अगर यह निर्णय गोपनीय था इसलिए कि भ्रष्टाचारी और काला धन जमा करने वाले लोग सचेत न हो जाएं तो ऐसे में सरकार का इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले गरीबों, मज़दूरों, किसानों और प्रतिदिन कमाकर खाने वालों का एक बार भी ख्याल क्यों नहीं आया? 



प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि "यह सरकार गरीबों के प्रति समर्पित है।" अगर सच में यह सरकार गरीबों के प्रति समर्पण की भावना रखती है तो दूसरे विकल्पों के माध्यम से कुछ ऐसे नियम बनाए जा सकते थे जिनसे इस फैसले को लागू करने से पहले गरीब, मज़दूर, किसान जैसे वर्ग आदि को सुविधाएं हो सकती थी। उनका कहना तो ये भी था कि देश का ईमानदार जागरूक नागरिक असुविधा को चुन सकता है। मगर भ्रष्टाचार को नहीं चुनेगा, ऐसी परिस्थितियों में यह ईमानदार जागरूक उस घुन के सामान प्रतीत होता है जिसे ज़बरदस्ती गेहूं के साथ पिसना पड़ रहा है। इस निर्णय को लागू करने के पीछे सरकार का सबसे बड़ा तर्क यह है कि भ्रष्टाचार कम होगा और कालेधन पर शिकंजा कसा जाएगा क्योंकि भ्रष्टाचार और कालेधन में अधिकतर बड़े नोटों का प्रयोग किया जाता है। अगर ऐसा है तो फिर सरकार एक हज़ार की जगह दो हज़ार का नोट क्यों जारी कर रही है? अधिकतर सन्दर्भ से भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भारत के लिए ये कोई नई बात नहीं है।   असंगठित अर्थव्यवस्था के कारण अभी देश को इस निर्णय पर पूरी तरह से अमल करने में समय लग सकता है। सरकार के इस फैसले से जाली नोट पर रोकथाम लगाई जा सकेगी। जाली नोट की समस्या से हमारा देश शुरू से ही परेशान रहा है। देश के बाहर से तस्करी कर के लाये जाने वाले जाली नोट जब तब बाजार में पकड़े जाते हैं। और इन पर पूर्णरूप से अंकुश लगाना मुश्किल था। मगर सरकार के इस फैसले से जाली नोट की समस्या का जड़ से सफाया होने की सम्भावना है। फिर भी एक समस्या यह खड़ी हो सकती है कि अगर पड़ोसी देश से नए नोट के जारी होने के बाद उसके जाली नोट बाज़ार में आ गए तब मुश्किलें पहले से और अधिक बढ़ सकती हैं क्योंकि हम पुराने नोट से जितनी भलीभांति परिचित है, उतना नए नोट से नहीं होंगे इसलिए नए नोट लागू करने के साथ सरकार को अब नोट की तस्करी के प्रति पहले से अधिक गम्भीर रहना पड़ेगा।

Abuzaid Ansari

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक होने के साथ-साथ भारतीय विज्ञान कांग्रेस (कोलकाता), और  नेशनल एसोसिएशन फॉर मीडिया लिटरेसी एजुकेशन (न्यूयॉर्क) के सदस्य हैं। और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं।




Saturday, 5 November 2016

मीडिया पर प्रतिबंध: कितना सही, कितना ग़लत -अबुज़ैद अंसारी

खींचो न कमानों को,  न तलवार निकालो

जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो


अकबर इलाहाबादी द्वारा लिखी गई यह पंक्तियाँ अपने आप में क़लम की ताकत को स्पष्ट करती हैं। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सन्दर्भ से भी देखा जा सकता है। मगर वर्तमान समय में ऐसी परिस्थितियां बन चुकी हैं कि उसको ध्यान में रखते हुए तो यही लगता है कि अब लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है। हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा एनडीटीवी  पर एक दिन के लिए लगाया गया प्रतिबंध इस बात को स्पष्ट करता है। एनडीटीवी पर आरोप है कि उसने पठानकोट हमले की रिपोर्टिंग में कुछ ऐसी गलतियां की जिसके कारण देश की सामरिक सूचना चैनल के माध्यम से लीक हो गई। मगर प्रश्न यह है कि एनडीटीवी के अलावा और भी टीवी चैनल ने पठानकोट में आतंकी हमले की रिपोर्टिंग की थी फिर सरकार ने उनके ख़िलाफ़ ऐसा कोई क़दम क्यों नहीं उठाया? एनडीटीवी ने स्पष्ट किया कि उसकी रिपोर्टिंग सामान्य और संतुलित थी। अगर ऐसा है तो फिर एनडीटीवी और दूसरे चैनल के मध्य रिपोर्टिंग में वो कौन से अंतर हैं जिसके आधार पर यह प्रतिबंध सिर्फ एनडीटीवी पर ही लगाया गया। अगर एनडीटीवी की दलील गलत है और सरकार का प्रतिबंध सही है तो सरकार को चाहिए कि वो अपना तर्क स्पष्ट करे ताकि इस प्रतिबंध पर उन लोगों को संतुष्टि हो सके जिन्हें इस पर आपत्ति है। अगर रक्षा संबंधी सूचना के लीक होने का मामला सही है तो सरकार का चैनल पर प्रतिबंध लगाना भी शत प्रतिशत सही है।



एक  बड़ा प्रश्न यह भी है कि एनडीटीवी ने ऐसी गलती की है तो सरकार को निर्णय लेने में इतनी देर क्यों लग गई? यह प्रतिबंध तो बहुत पहले ही लग जाना चाहिए था क्योंकि पठानकोट घटना तो जनवरी में हुई थी और उसे बीते हुए लगभग दस माह गुज़र चुके हैं।यहाँ बात सिर्फ एक टीवी चैनल का पक्ष लेने या उसके प्रति हमदर्दी और दूसरे चैनल के प्रति घृणा करने की भी नहीं है। बात संपूर्ण मीडिया जगत के लिए है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। अगर पत्रकारिता के प्रति देश की सरकार का ऐसा रवैय्या रहा तो वैश्विक स्तर पर भारत की छवि एक धुंधले लोकतांत्रिक देश जैसे हो जाएगी, या फिर कहीं ऐसा न हो कि भारतीय मीडिया को लोग उत्तर कोरिया, बर्मा, सीरिया और सऊदी अरब जैसे देशों की मीडिया में शुमार करने लगें, जहाँ मीडिया एक ज़िंदा लाश है। 

मीडिया का कर्त्तव्य लोगों तक सूचना, शिक्षा, मनोरंजन पहुँचाने के साथ-साथ समाज की समस्याओं को उजागर करना और लोगों को उनके प्रति जागरूक करना है। मगर परिस्थितियों को देख कर ऐसा लगता है जैसे मीडिया अपने इस कर्त्तव्य को भूल चुका है। वर्तमान समय में भारतीय मीडिया दो पक्षों में विभाजित होता प्रतीत होता है। किसी बात पर एक पक्ष अगर हाँ कहता है तो दूसरा बदले में उस पर नहीं के संकेत देता है। एक चैनल अगर सरकार की किसी विशेष उपलब्धि को लेकर उसका गुणगान करता है तो दूसरा उसी विशेष बात को मुद्दा बना कर उसकी निंदा करे बिना नहीं रह सकता। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में पड़ी ये दरार उसे कमज़ोर बनाती है। अगर ऐसे ही ये दरार गहराती रही तो किसी दिन यह स्तंभ इसी दरार के कारण टूट कर बिखर जाएगा।

Abuzaid Ansari

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक होने के साथ-साथ भारतीय विज्ञान कांग्रेस (कोलकाता), और  नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ मीडिया लिटरेसी एंड एजुकेशन (न्यूयॉर्क) के सदस्य हैं। और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं।




Tuesday, 10 February 2015

दिल्ली में "आप" की जीत के निहितार्थ

हालिया दिल्ली चुनावों में आम आदमी पार्टी की जीत भारतीय लोकतंत्र के जीवंतता का सूचक है। अरविन्द केजरीवाल ने एक बार फिर उन सारे राजनीतिक पंडितों को धता बता दिया जो कि लोकसभा चुनावों के बाद "आप" के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहे थे। ये जीत एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है और देखना दिलचस्प रहेगा कि इस अवसर का "आप" किस प्रकार उपयोग करती है। देश के दिल दिल्ली में "आप" की सरकार कुछ हद तक केंद्र में एक विपक्ष की कमी को पूरा करने का कार्य करेगी। आशा है कि ये नतीजे सत्ता के आकंठ में डूबी भाजपा को भी जगाने में सफल होंगे। भाजपा को ये समझ आ जाना चाहिए कि अब "हनीमून" का समय समाप्त हो चला है और ज़रूरी ये है कि राज्यों के चुनावों में मतदाताओं को "मोदी" मन्त्र तथा नकारात्मक प्रचार के बदले ठोस स्थानीय मुद्दे तथा स्थानीय चेहरे पेश किये जाएँ। इन चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि मोदी की "भाजपा" अजेय नहीं है पर ऐसा कहना भी ठीक नहीं होगा कि ये नतीजे केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली के प्रति आम जनता रोष को प्रदर्शित करते हैं। दिल्ली की जनता के एक बड़े तबके में काफ़ी पहले से ही "केजरीवाल फॉर सीएम, मोदी फॉर पीएम" के स्वर बुलंद थे। इसका प्रतिफल पिछले दिल्ली विधानसभा और लोकसभा चुनावों दोनों में ही देखने को मिला। इस बार भी भाजपा को मिले ३२ प्रतिशत वोट यह दिखाते हैं कि दिल्ली में पार्टी ने भले ही एक बड़ा टुकड़ा ज़रूर खो दिया हो पर पूरी ज़मीन नहीं खोई है। आगामी बिहार चुनावों में भाजपा को चाहिए कि एक साफ़ प्रतिबद्ध चेहरा (जो स्थानीय नेतृत्व में दूर-दूर तक नज़र नहीं आता) सामने रख ज़मीनी सच्चाई के बल पर चुनाव लड़े। अगर आम आदमी पार्टी बिहार के चुनावों में कदम रखती है (हालाँकि आसार नज़र नहीं आते) तो इसके लिए लोकसभा चुनावों से सबक ले ये ध्यान रखना होगा कि दिल्ली और बिहार के सामजिक समीकरणों में ज़मीन-आसमान का फर्क है। 
                                                                               - आकाश कुमार
                                                                                   प्रमुख संपादक

दिल्ली के चुनावी युद्ध में आज आम आदमी पार्टी ने ये साबित कर दिया है कि देश में चुनाव जीतने, सरकार बनाने और बहुमत लाने के लिए जाति-धर्म के अलावा और भी मुद्दे हैं जिनके दम पर मज़बूत सरकार स्थापित की जा सकती है। ये जीत आम आदमी की जीत है। भारतीय  इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा के हमने एक ऐसा चुनाव देखा,जो डंके की चोट पर आम आदमी के आधारभूत मुद्दों पर लड़ा गया, और आज बहुमत से भी बहुत अधिक सीटों से जीता गया।  ये चुनाव उन पार्टियों के लिए एक सन्देश देता है जो कहीं ना कहीं वोट बैंक बढ़ाने के लिए बीच में उन मुद्दों को ले आते हैं जिससे आम आदमी का भला और विकास नहीं हो सकता, जो ना विकास के रास्ते की तरफ से आते हैं और ना ही उस ओर जाते हैं। आज का आम आदमी अपने जीवन में आराम औ' सुकून चाहता है। उसे ज़रुरत है ऐसे मज़बूत तंत्र की जो उसकी आधारभूत ज़रूरतों पानी, बिजली, स्वछता, स्वास्थय, परिवहन सुविधाएं, सुरक्षा आदि की पूर्ति कर सके।

आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में बहुत बड़ी संख्या में ऐसी आबादी है जिसकी आधारभूत ज़रूरतें खस्ताहाल हैं। लोग अनधिकृत कॉलोनी और झुग्गी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। छोटे तबके के गरीब लोग, फैक्ट्रियों में मज़दूरी करने वाले, सड़कों पर रिक्शा तथा ऑटो, छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे बाहर से आये हुए लोगों की ज़िन्दगी के तमाम सपने आज भी अधूरे हैं। आधारभूत ज़रूरतों का ख़र्च बढ़  गया है, लेकिन हालात वैसे के वैसे ही हैं। आज दिल्ली की कुल आबादी का 40 % हिस्सा प्रवासी लोगों का है, जिनमे से अधिकतर लोग  गरीबी, बेरोज़गारी, तंगहाली से परेशान होकर देश के दिल दिल्ली में अपने दिल में बसी बहुत सी आशाओं के साथ आते हैं। दिल्ली एक ऐसा राज्य है जहाँ आज देश के हर हिस्से का आम आदमी बसा हुआ है और यहाँ की चुनावी जीत से देश के हर हिस्से में बहुत प्रभावी सन्देश पहुंचेगा , आम आदमी पार्टी  दो राष्ट्रीय पार्टी "बीजेपी" और "कांग्रेस" को ज़ोरदार टक्कर देने  के बाद यह देश के दूसरे राज्यों में होने वाले चुनावों में बहुत प्रभावी ढंग से खुद को पेश कर सकती है।

कांग्रेस डूबती हुई नौका है जिसमे अब कोई भी नही बैठना चाहता, उसके अपने सवार ही उसे छोड़ कर भाग रहे हैं। यह कांग्रेस के लिए बड़ी चिंता का विषय है और अब कांग्रेस को वोट बैंक नहीं बल्कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ना होगा। यह बीजेपी के लिए भी बहुत बड़ा झटका इसलिए है क्योंकि इस बार चुनाव में ना मोदी मंत्र चला ना मोदी तंत्र, ज़ाहिर है कि लोकसभा चुनाव में ज़बरदस्त जीत हासिल करने वाली बीजेपी के दांत खट्टे पड़ चुके हैं, और इस हार से बीजेपी के आत्मविश्वास को बहुत गहरी चोट पहुंची है। एक सबसे ख़ास बात यह देखने को मिली कि प्रधानमन्त्री मोदी ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होनें दिल्ली के भावी मुख्यमंत्री केजरीवाल को उनकी जीत पर सबसे पहले बंधाई दी।  इसे मोदी जी का बड़प्पन समझा जाए या फिर यूँ समझें के वो खिसिया से गए हैं।  चुनाव प्रचार के दरम्यान "आप"  प्रतिद्वंद्वी प्रधानमन्त्री मोदी द्वारा दी गई इस बंधाई से साबित है वह देश का विकास चाहते हैं चाहे सत्ता में कोई भी सरकार हो और "पांच साल केजरीवाल" मंत्र से लोगों को बहुत उम्मीदें हैं और लोगों द्वारा इसके जाप ने अपना असर दिखा ही दिया है अब तो दिल्ली के लोग बदलाव देखना चाहते हैं । केजरीवाल अब उन क्षेत्रीय पार्टियों के लिए खतरे की घंटी है , जिन्होंने आम आदमी को अब तक  बेवक़ूफ़ समझ रखा है।

आज दिल्ली के चुनावी नतीजे देख कर दुनिया हैरान है और इन परिस्तिथियों में मुझे अपनी ग़ज़ल का एक शेर याद आता है...

उम्मीद क्या थी क्या से क्या अंजाम हो गया
दिल आज फिर ये इश्क़ में नाकाम हो गया

लोगों में उत्साह है, नई उम्मीदों के साथ अब लोगों को देश के दिल दिल्ली में नए जज़्बातों के साथ सुनहरा भविष्य नज़र आ रहा है। आज दिल्ली की जनता ने साबित कर दिया है कि लोकतंत्र में कोई अजेय नहीं होता, ज़्यादा घमंड और अति आत्मविश्वास , पार्टी हो या व्यक्ति सबको ही ले डूबता है। मैं मानता हूँ कि दो करोड़ की आबादी वाले इस शहर दिल्ली में लोगों के पास समय का अभाव है। फिर भी जनता ने अपने समय और वोट का भरपूर प्रयोग किया है। देश की राजधानी दिल्ली को आज छोटा भारत कहा जाता है और इस छोटे भारत से बड़े भारत को अब बड़ी उम्मीदें हो चली हैं।


अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.
 (चित्र: श्री अनिल भार्गव, सलाहकार- जीवन मैग)

Monday, 19 January 2015

Frank Bainimarama: Hitler of the Pacific

Frank Bainimarama, is the current military Prime Minister of Fiji. One of my most recent interactions with him before shifting to New Zealand was in November, 2011 at an awards ceremony. I was receiving the award for the “Best Young Writer” by the Kailaand the Fiji Times at Holiday Inn in Suva. He was the chief guest and I was the award recipient. Amidst the claps while handing me the award, he said something very intimidating to me. His exact words were “so you’re the one who writes about me and also gets away with it” followed by an elusive laugh. Though he may have said it flippantly but there was something in his tone that caught my attention. Coincidentally two days before receiving the award I had written an article of a class 3 girl who was not allowed in a bus as her bus voucher was wet and a bit torn. The irony was that I condemned the Minister of Public Service and Transportation for allowing such an incident to happen and the Minister of Transportation in question was Frank Bainimarama himself.

In recent days, international media has become bolder in labeling Frank Bainimarama a dictator. But the main question should be is Bainimarama just a dictator? The term dictator is not quite enough to explain the questionable actions and decisions that Bainimarama has taken in the recent past.

To understand Bainimarama’s regime, the readers first must understand the coup and military history of Fiji. A coup in simple terms means removal of power or takeover of a country by illegal means. Fiji is a small Island nation of approximately 800,000 people. After gaining independence from Great Britain in 1970, began the short yet eventful history of coups, and takeovers. Fiji’s first coup materialized in 1987. This was led by a Military leader called Sitiveni Rabuka. On 14th May, 1987 Rabuka entered the Parliament and announced “Sit down everybody, sit down. This is a take-over. Ladies and gentlemen, this is a military take-over. We apologize for any inconvenience caused [to the MP’s]”. The second coup also took place in 1987 and the third one in 2000 by a businessman named George Speight. The fourth and most recent military takeover was in December, 2006 led by the military Commander-in-chief, Frank Bainimarama himself.

Frank Bainimarama over the past few years has become a very prominent figure in Fiji because of  his relationship with Fiji’s first Prime Minister, Late Ratu Sir K.K.T.M Mara (being his eldest son-in-law). In 2006, in the Pacific island nation of Fiji, troops overran the capital city, threatened the Prime Minister, forced his resignation, placed him under house arrest, imposed censorship on the media, and the coup leader, in the form of the head of the army, went on television to declare himself the new ruler of the country. This was the beginning of a new era in Fiji - the era of Bainimarama regime.

The first mistake that Bainimarama did was to overthrow the previous government. The 2006 coup also had a negative impact on the tourism industry of Fiji. The December 2006 resulted in a major decline in the level of international tourism activity. Although the timing of the unrest was at the very end of the year it was enough to disrupt tourism activity over the normally busy Christmas and New Year. After that the country was declared an “emergency state” and no one was allowed to have [from subjective experience] gathering at home. If one was entertaining guest that exceeded more than 7 people, one has to take permission from the police or else the military will arrest everyone under the delinquency of plotting to assassinate the prime minister of the country.

Another situation that is very controversial is the Bainimarama versus Qarase case. Laisania Qarase is the last democratically elected Prime Minister of Fiji and was ousted by the Militiary government in December, 2006. In this case the President (pressured by Bainimarama post the takeover) dismissed Laisania Qarase as the Prime Minister of Fiji.

Moreover during the trial of Laisania Qarase in 2012, Qarase was charged with six counts of abuse of office and three counts of discharge of duty with respect to a property in which he has a private interest.Numerous international critics including the Commonwealth and the Pacific Forum claim Fiji's country system is controlled by the military regime and has no independence. It is a known fact that Bainimarama's government had demolished the previous judiciary system and brought in new judges from Sri Lanka in 2009.

One of the more astounding decisions of Bainimarama is the number of ministry portfolios that he and his Attorney General, Aiyaaz Sayeed Kayyum hold among themselves. Bainimarama alone handles the portfolio of “Prime Minister and Minister for Finance, Strategic Planning, National Development and Statistics; Public Service; People's Charter for Change and Progress; Minister for Information, National Archives and Library Services of Fiji; Minister for I-Taukei; Provincial Development and Multi-Ethnic Affairs and Sugar Industry, Acting Minister for Lands and Mineral Resource.” That speaks volumes on the dominant nature of Frank Bainimarama.

It is questionable on why a coup regularly happens in Fiji. Fijian political unity is an illusion, a chimera that can never be achieved, let alone forced upon the people). Even though Bainimarama has been cited a dictator by many people, he has also done quite a lot for the people of Fiji. For long, the military forces in Fiji had been the strong supporters of the long-established customary leaders. This was reflected in their conduct of two coups in 1987 with Rabuka to protect traditional Melanesian interests. From 2000, behind Commodore Bainimarama, the army has completely changed its position, championing equal rights for all the citizens, and contesting the archaic customary power.

Frank Bainimarama may have had good intentions in his heart of making Fiji a better place to live in, but his actions have contradicted it. From overthrowing a perfectly legitimate democratically elected government to putting his foot in the Qarase court case, he has done it all. My question again: Is Bainimarama the Hitler of the Pacific?

Ashneel J Prasad is  the Oceania (New Zealand/ Fiji) correspondent of JeevanMag.com A Fijian of Indian descent, Ashneel is currently a student of B.A communications at Massey University, Auckland, New Zealand.

Tuesday, 14 October 2014

Mark Zuckerberg and the free internet utopia

The Facebook Founder- CEO, Mark Zuckerberg just visited India.Some people have an opinion that he is doing some innovation again & some say that he is working on a free internet program for India. Some think that he came to India just for the internet.org summit while some envision him taking India to the Global level. (You gotta kidding me, it's just FB level)

As we know that India is develping rapidly, the number of internet users is increasing. A large section of the internet-addicts have a utopian vision that we are going to have a free internet service. It would mean that I would be able to play games online for free. It means that I would be able to watch my favorite movies for free. It means that we would be able to access the online courses for free. No, absolutely not. Facebook is partnering with Airtel to bring a kind of free internet service which would just mean a free Facebook access. Might be a free access to WhatsApp & Instagram too because they are owned by Facebook. But, certainly not any of the productive things mentioned earlier.
So, Facebook is just working on business agenda. The more we spend our time Facebooking, the more we kill our time expanding the profit of Facebook. Don't get it wrong! I am not against Facebook usage. I am just making a point that how can Facebook show a totally commercial project as a philanthropic one.


Zuckerberg met PM Modi on his India visit & Mr. PM was delighted to have him! And why not, Facebook has played a crucial role in his election campaign. So, he owes Mr. Zuckerberg too.

So, Mark Zuckerberg said- "Internet connectivity is a human right." Then why does this internet connectivity only means Facebook connectivity? "When one billion are offline, the world is robbed of ideas"- What type of ideas? I don't know, even u too, I think. He stated that he wants to empower the Indian youth. Is that just possible with facebook?
Zuckerberg said  "Lack of relevant local language content is why most Indians don't use internet". True, but what would Facebook be doing in this regard?
"I Want to help build an internet which is affordable for everyone". Great, but can he promise to build it to provide us an edutaining experience, an experience which would not just be restricted to Facebook?

Vikash Anand Jha is Public Relations officer at JeevanMag.com. He hails from East Champaran, Bihar & is pursuing B.Tech from Maharshi Arvind Engineering college, Jaipur.

Tuesday, 30 September 2014

भारत का मंगलयान- अबूज़ैद अंसारी

कल्पना की उड़ान.... चित्र: विष्णु सुशील (सधन्यवाद)
हमको आज हर्ष है, गर्व है, अभिमान है। 
हमने बनाया विश्व में कैसा कीर्तिमान है।

उपलब्धियाँ हमारी देख सकल संसार हैरान है

मंगल कक्षा में पहुँचा भारत का मंगलयान है।
  
 
अबूज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में बारहवीं कक्षा के छात्र हैं. आप जीवन मैग के सह-संपादक हैं और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं.

Friday, 1 August 2014

एफवाईयूपीः एक नवोन्मेषी शिक्षा प्रणाली की हत्या

दिल्ली विश्वविद्यालय और यूजीसी में लम्बी खींचतान के बाद डीयू के कुलपति ने चारवर्षीय पाठ्यक्रम को लौटा कर पुनः त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू करने का फैसला किया है. इस प्रकरण ने कोई सवाल सुलझाया नहीं है, बल्कि कई नए सवाल खड़े किए हैं। इसने उच्च शिक्षा के तंत्र में मौजूद गंभीर गड़बड़ियों को भी उजागर किया है। अगर देश के एक बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के साथ ऐसा हो सकता है, तो छोटे और देश के कोने-कोने में स्थित विश्वविद्यालयों का हाल जाना जा सकता है। कुछ लोगों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति, सुविधापरस्ती और स्वयं-स्वार्थ सिद्धि के लिए शिक्षा व्यवस्था में इतनी जल्दी उलटफेर की. शिक्षा में इस कदर राजनीतिक दखल दुर्भाग्यपूर्ण है. वैसे तो सरकार यह कहती रही कि वह यूजीसी और डीयू के इस मामले में दखल नहीं देगी. किंतु यह पूरी तरह स्पष्ट है कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार के दबाव में ही यूजीसी ऐसा कर रही थी. यदि ऐसा नहीं है तो फिर डेढ़ साल तक वह चुप क्यों रही.
गौरतलब है की पिछले साल 23 जुलाई को यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को एक चिट्ठी लिखकर इस कोर्स को शुरू करने की सहमति दी थी. यह एक न्यायालीय शपथ पत्र था जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि चारवर्षीय पाठ्यक्रम किसी प्रकार से शिक्षा नीति के विरुद्ध नहीं है. इतना ही नहीं यूजीसी ने डीयू में नए पाठ्यक्रम को लागू करने में मदद हेतु सीएसआईआर के महानिदेशक एस के जोशी के नेतृत्व में 5 सदस्यों की एक सलाहकार समिति गठित की थी. इस समिति ने 25 फरवरी 2014 को अपनी रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि नया पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति का अनुपालन नहीं करती है. और तब इस रिपोर्ट के आधार पर यूजीसी 20 जून से इसे वापस लेने हेतु लगातार डीयू पर दबाव बनाये रखती है. क्या यूजीसी रिपोर्ट के तुरंत बाद ऐसा नहीं कर सकती थी जिससे नामांकन प्रक्रिया में भी दिक्कतें नहीं आतीं. क्या एस के जोशी कमिटी सचमुच मदद के लिए बनी थी या जांच के लिए ? उसे अपनी रिपोर्ट देने में इतना लम्बा वक्त क्यों लगा ?
जाहिर है या तो यूजीसी तब यूपीए सरकार के दबाव में फैसला कर रही थी या वह अब एनडीए सरकार के इशारे पर ऐसा कर रही है जिसने अपने दिल्ली घोषणा पत्र में इसका वादा किया था. सवाल तो यूजीसी की स्वायत्तता का है. क्या यूजीसी अपने विवेक के बजाय सरकार के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचती रहेगी ? यह देश की शिक्षा संस्थानों और विद्वानों की समितियों के लिए शर्मनाक है. जैसे सीबीआई निदेशक रंजीत सिंह ने ये कहते हुए सरकार को सावधान कर दिया था की केन्द्रीय जांच ब्यूरो पिंजरे में बंद तोता नहीं है वैसे ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सरकारी दबाव और नीच राजनीति से ऊपर उठ कर काम करना चाहिए. डीयू कुलपति दिनेश सिंह की बजाय यूजीसी अध्यक्ष वेद प्रकाश को इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि वे अपनी संस्था की स्वायत्तता की रक्षा करने और विवेकपूर्ण फैसले लेने में नाकाम रहे हैं. ये वहीँ वेद प्रकाश हैं जो एफ.वाई.यू.पी लाने के समय में भी यूजीसी के अध्यक्ष थे. इन श्रीमान ने ही फरवरी में दिल्ली विश्वविद्यालय के वार्षिक उत्सव अन्तरध्वनि के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए दस मिनट तक चारवर्षीय पाठ्यक्रम और पाँच मिनट तक दिनेश सिंह की तारीफ की थी. यह सब ड्रामा नहीं तो क्या है या फिर था ?? 


एक सत्य यह भी है कि एफवाईयूपी की खिलाफत करने वाले अधिकांश लोग ना तो इस पाठ्यक्रम का हिस्सा थे न ही वे इसकी पूरी संरचना और पाठ्यक्रम से परिचित थे. विरोध करने वाले मुख्यतः राजनीतिक पृष्ठभूमि से थे. दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन ने बीते कुछ सालों से राजनीतिक छात्र संघों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है. इससे उन छात्र संघों में असंतोष है जो इस विरोध में सामने आ रहा है. दूसरी ओर डीयू प्रशासन ने शिक्षकों के मनमानी पर भी रोक लगायी है. अब उन्हें नियमित क्लास लेना होता है. समय से आना और जाना होता है. अब उन्हें बच्चों के साथ मिलकर कठिन मेहनत करनी पड़ती है जो उनकी चाहत और आदत के विपरीत हैं. ऐसी भी बात चल रही है कि अब शिक्षकों को कालेज आते और जाते समय अंगूठे का निशान लगाना होगा. फलस्वरूप शिक्षकों में घोर असंतोष है और वे एफ.वाय.यू.पी के बहाने कुलपति का विरोध कर रहे हैं. एफ.वाय.यू.पी के तहत प्रथम वर्ष के छात्र अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. इनमें से अधिक छात्र छुट्टियों में घर गए हुए हैं. फलस्वरूप उनकी संगठित आवाज मीडिया में नहीं आ पायी. दूसरी और बीटेक के छात्र काफी परेशान थे. लेकिन यूजीसी ने उन्हें बड़ी राहत देते हुए इस कोर्स को समान पाठ्यक्रम के साथ चार साल का रहने दिया है. लेकिन यह सिर्फ 2013-14 बैच के छात्रों के लिए होगा अर्थात इस सत्र से बीटेक पाठ्यक्रम में नामांकन नहीं होंगे. यह एक तरह से प्रयोग ही होगा. देखना है इस बैच के छात्र क्या गुल खिलते हैं. यदि ये छात्र पढ़ाई के साथ प्लेसमेंट में आईआईटी के समांतर महत्वपूर्ण सफलता अर्जित करते हैं तो चार वर्षीय पाठ्यक्रम पुनः विचारणीय बन जाएगा. मसलन इस बैच का परिणाम एफ.वाय.यू.पी की सार्थकता सिद्ध कर सकता है. ध्यान रहे की इनके साथ कोई निकृष्ट राजनीति ना होने पाए.    

अब बात चारवर्षीय पाठ्यक्रम की. एफवाईयूपी महात्मा गाँधी के प्रयोगात्मक शिक्षा नीति और हाथों के प्रयोग पर आधारित थी. हमारी पारंपरिक शिक्षा पद्धति केवल सैद्धांतिक रूप से समृद्ध रही है. फलस्वरूप भारत हमेशा से शोध एवं अनुसंधान में पिछड़ा रहा है. लेकिन इस नये पाठ्यक्रम में सिद्धांत के साथ परियोजना कार्य, फील्ड वर्क, प्रयोग एवं शोध को समान महत्त्व दिया गया था ताकि विद्यार्थियों को कार्य कुशल बनाया जाए. चार साल के दौरान उन्हें इंटर्नशिप के साथ साथ शोध का भी मौका मिलता. इससे हिंदुस्तान में सामूहिक कार्यों एवं शोध-प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता. एफवाईयूपी को बाज़ार की जरूरत के अनुसार तैयार किया गया था ताकि पढ़ाई समाप्त होते ही छात्रों को नौकरी मिल सके. संभव था इस पाठ्यक्रम का दूरगामी सकारात्मक प्रभाव होता. याद होगा राजीव गाँधी ने जब सूचना क्रांति का आह्वान किया था तो उनका भी भयंकर विरोध हुआ था.
एफवाईयूपी के तहत छात्रों को एक विषय में 20 पेपर के साथ विशेषज्ञता प्रदान की जाती. इसी विषय में उन्हें चार व्यवहारिक कोर्स के पेपर पढ़ने होते जिससे वे उस विषय से संबंधित कार्यों के लिए दक्ष और प्रशिक्षित हो सकें. साथ ही छात्रों को अपनी पसंद के दूसरे विषय में 6 पेपर पढ़ने होते. वे आगे इसमें मास्टर्स भी कर सकते थे. इसके अतिरिक्त 11 फाउंडेशन कोर्स हैं जो छात्रों को विभिन्न विषयों की आधारभूत जानकारी देते हैं. विरोधी इन कोर्सों का जम कर विरोध कर रहे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि आज की दुनिया मल्टीटास्किंग है अतः विद्यार्थियों को सभी विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है. इन कोर्सों का मुख्य उद्देश्य था छात्रों में हरफनमौला व्यक्तित्व के साथ उनमें नैतिकता और रचनात्मकता का विकास करना. और किसी छात्र में सृजनात्मकता विकसित करना और नैतिकता के पतन को बचाना ही शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण ध्येय है. विरोधियों का कहना था कि ये सब 12वीं तक पढ़ाया जाना चाहिए. लेकिन सच पूछिए तो ये चीज़ें जीवन भर पढ़ी पढ़ाई जाये तो भी कम ही होगी.
विरोधी मानते हैं कि इस नए पाठ्यक्रम में एक साल बेकार में बर्बाद किया जा रहा था. लेकिन पाठ्यक्रम में इन मौलिक परिवर्तनों के निवेश के लिए तो एक साल बढ़ाना ही पड़ता अन्यथा पूरा पाठ्यक्रम विद्यार्थियों के लिए बोझ बन जाता. दूसरी बात, यह सही है कि तीन की बजाय चार साल के पाठ्यक्रम में छात्रों का खर्च बढ़ जाता. ख़ासकर जो दिल्ली से बाहर के और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र हैं उनकी मुश्किलें बढ़ जातीं. लेकिन यह भी तो मानना चाहिए कि इस चार साल के पाठ्यक्रम के बाद छात्रों को आसानी से नौकरी मिल सकती थी. वैसे भी अधिकांश छात्र स्नातक के बाद या तो मास्टर्स करते हैं या फिर किसी शहर में ही ठहर कर सामान्य प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते हैं जिसमें अपेक्षाकृत अधिक ही खर्च आता है. 
नए पाठ्यक्रम की आत्मा थी शोध. भारत हमेशा से इस क्षेत्र में पिछड़ा रहा है. हमारे देश में माध्यमिक शिक्षा पाने वालों में 20 प्रतिशत से कम ही लोग उच्च शिक्षा में आ पाते हैं. और इसका भी शतांश हिस्सा ही मास्टर्स, एमफिल, पीएचडी और रिसर्च में जाते है. लेकिन इस युगांतकारी शिक्षा प्रणाली में स्नातक के छात्रों को शोध-अध्ययन का मौका मिलता. इससे ना केवल शोध की तरफ आकर्षित होने वालों की तादाद में इजाफा होता अपितु हम भी जापान की तरह तेजी से तरक्की के सपने को साकार कर पाते. संभव था कुछ वर्षों बाद हमारे यहाँ भी नोबेल पुरस्कार आने लगते.

इस बात में भी कोई दोराय नहीं इस नए पाठ्यक्रम को बिना किसी सर्वेक्षण या अध्ययन के आनन-फानन में लागू कर दिया गया. गौरतलब है कि अपने समर्थन में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने योजना आयोग की बारहवीं योजना के दस्तावेजों का सहारा लिया, जिसने सिर्फ एक पैराग्राफ में भारत की स्नातक शिक्षा की कमी को दूर करने के उपाय के रूप में चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा है। लेकिन यह और भी दुखद है कि इस लोकतांत्रिक देश में योजना आयोग जैसी संस्था ने भी इस नतीजे पर पहुंचने के लिए किसी सर्वेक्षण या अध्ययन की जरूरत महसूस नहीं की. नए पाठ्यक्रम के विरोधियों के इस तर्क में भी कम दम नहीं कि दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद कुलपति के कृपापात्रों से भरी पड़ी है या उनके दबाव में काम करती है. लेकिन इस बदलाव से कुलपति का कोई निजी स्वार्थ जुड़ा हो ऐसा भी तो नहीं कहा जा सकता. हाँ ऐसा हो सकता है कि उनके मन में एक नव युगप्रवर्तक कहलाने की महत्वाकांक्षा पल रही हो जिसकी सीधी टक्कर अन्य लोगों की महत्वाकांक्षाओं से हुई हो जो ईर्ष्यावश इस परिवर्तन के मुखालफ़त में कूद पड़े. गाँधी और बुद्ध का यह भारत कब तक कुछ गिने चुने लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की टक्कर का दंश झेलता रहेगा. याद रहे कुलपति को इसी साल शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पद्मश्री प्रदान किया गया.
यक़ीनन एफवाईयूपी में बहुत कमियां थीं. बावजूद इसके हमारी शिक्षा प्रणाली को सुधारने का यह एक बेहतर विकल्प था जिसमें समय के साथ सुधार किया जाना चाहिए था बरक्स इसे सीधे ख़त्म करने के. कहते हैं- नदी के मध्य में पहुँच कर लौटने से बेहतर है की आगे का सफ़र जारी रखा जाए. कभी न कभी हमारे देश में वक्त की मांग पर यह पाठ्यक्रम प्रणाली पुनः दस्तक देगी और तब हमें कुछ पीछे रह जाने का दुखद एहसास भी जरूर होगा.


नन्दलाल मिश्रा जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।




A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan

A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan
Proudly sponsored by JeevanMag.com
 
Copyright © 2016 Jeevan Mag
Editor-in-chief Akash Kumar Executive Editor Nandlal Mishra Associate Editor AbuZaid Ansari Publisher Blue Thunder Student AssociationShared by WpCoderX
Blogger Widgets