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Monday, 5 January 2015

ज़िंदगी गुलज़ार है- अमिनेष

ज़िंदगी गुलज़ार है।

तमाम उलझनों से।
परेशानियों से।
उन तन्हाइयों से।
खुशी और गम का व्यापार है।

ज़िंदगी गुलज़ार है।

अपनी हसरतों से।
दुनिया कि उम्मीदों से।
यादों की गलियों से।
मौन पहेलियों से।
हसीन सपनों का बाज़ार  है।

ज़िंदगी गुलज़ार है।

टूटते रिश्तों से।
रुठते फरिश्तो से।
गुमशुदा मंजिलो से।
बेज़ार है।
फिर भी जाने क्युँ;
यह दिल
जीने को बेकरार है।

ज़िंदगी गुलज़ार है। 



(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)

Roman Text




Zindagi Gulzaar hai


Tamaam uljhanon se.
pareshaniyon se.
un tanhaiyon se.
khushi aur gham ka vyaapaar hai.

Zindagi gulzaar hai

Apni hasraton se.
duniya ki ummedon se.
yaadon ki galiyon se.
maun paheliyon se.
haseen sapnon ka bazaar hai.


Tootte rishton se.
ruthte farishton se.
ghumshuda manzilon se.
bezaar hai.
fir bhi jaane kyun;
yeh dil
jeene ko bekarar hai.
Zindagi gulzaar hai



Aminesh Aryan  is an editorial board member at JeevanMag.com and a student of Political Science Honors. at the Banaras Hindu University. He comes from Vaishali in Bihar.

Saturday, 13 December 2014

आख़िर किस ओर युवा भारत?

लोकतंत्र के 65 वर्षो में हमारा भारत कितना परिपक्व हुआ है यह हमें यदा कदा पता चलता रहता हैं जब अख़बार के एक ही पन्ने के चौथाई भाग में मुज़फ्फरनगर के दंगे और भारत का मंगल मिशन साथ प्रकाशित होता है। उसी भारत भूमि का जिसकी सभ्यता 5000 हज़ार साल पुरानी हैं, एक युवा मंगलयान के लिए विशिष्ट उपलब्धि हासिल करता हैं और एक युवा भारतीय दंड संहिता की धारा 148 के तहत जेल में बंद होता है। क्या इस खाई का निर्माण हम युवाओं ने किया है?  
एक ऐसा वर्ग जिसकी ज़रूरत रोटी और रोजगार है वो सड़कों पर धर्म के नाम का हथियार लेकर चलती हैं।
एक ऐसा वर्ग जिसके सदस्य जहाँ राष्ट्रीय भावना में पाक-चीन की सरहदों पर देश की रक्षा करते हैं, उसी वर्ग के दूसरे सदस्य क्षेत्रीय संस्कृति, क्षेत्रीय भाषा, के नाम पर क्षेत्रीय पार्टियों के उकसावे पर राष्ट्र हित तक त्याग कर देते हैं।
आज वर्षों बाद भारत दुनिया का सबसे युवा देश हैं और बहुत खुशी की बात हैं की एक युवा देश, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, और उस लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर, आज विकास-रोजगार और देशहित में नहीं बल्कि आत्सम्मान, गोडसे , मंदिर, मस्जिद, धर्मपरिवर्तन, माफ़ी , गीता, हिंदू , गर्व हैं की मुसलमान हूँ,गर्व हैं RSS से हूँ इत्यादि इत्यादि राष्ट्र विनाशक तत्वों की बात करता है। हमें समय रहते चेतना होगा ताकि इस सबका परिणाम हमारा यह युवा राष्ट्र न भुगते।
जाने किस उदयमान युवा भारत की चर्चा एक सफ़ेद ढाढी, हाफ़  बंडी- कुर्ते पहनने वाला व्यक्ति विश्व के मंच पर करता है? 


(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)

Wednesday, 3 December 2014

दिल बनारसिया- शिव के उत्तराधिकारी- बनारस राज

उन ख़ामोश पत्थरों में दफ़न थीं हज़ारों अनसुनी कहानियाँ जो सदियों सें गंगा की सुरमयी लहरों को निहारते उस किले में किसी निर्जीव की तरह जड़ दिए गए थे
चुनार के लाल पत्थर की आभा अब धूमिल हो चुकी थी। जो कुछ लाली बची थी वो खुद को सूर्यास्त के किरणों के साथ संवार रही थी, गंगा के दर्पण में खुद को निहार रही थी।  वो आज भी सीना तान खड़े होने की ज़ुर्रत में थी कि माँझी के पतवार ने उसके घमंड को अस्थिर कर दिया।  


काशी नरेश की ये कोठियां बनारस राज के शान की प्रतीक हैं। उस शाही झरोखे की तरफ़ आज भी उसी आदर सम्मान की तरह देखा जाता हैं जैसे कभी काशी नरेश को शिव का उत्तराधिकारी माना जाता था... और शायद आज भी।

इस बात का साक्षात प्रमाण है कि प्रत्येक वर्ष रामनगर की भव्य रामलीला का शुभारम्भ राजा साहब अपने हाथों सें करते थे। जिस तरह पुरी महाराज का महत्व रथयात्रा के लिये उसी तरह काशी नरेश रामलीला के लिये....वहीँ रुतबा, वहीँ शाही सवारी, वहीँ शानो शौकत...और वहीँ सजदे में झुकते दिल। 

 कहते हैं..... 
"The king is always a king whether he has his state or not. He was, he is and he will be the king in the heart of his people."

इतिहास के इन्हीं पलों को संजोये रामनगर का किला जर्जर लेकिन जर्रा जर्रा जीवित प्रतीत होता है। 

 
(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)
Facebook: www.facebook.com/aminesh.aryan


दिल बनारसिया की पहली कड़ी यहाँ पढ़ें- http://www.jeevanmag.com/2014/07/blog-post_16.html
दिल बनारसिया की दूसरी कड़ी यहाँ पढ़ें- http://www.jeevanmag.com/2014/09/dil-banarasiya-2.html

Thursday, 30 October 2014

यादों की बारिश- लोकआस्था का महापर्व छठ

अक्टूबर २९, २०१४ 
फ़ीनिक्स, एरिज़ोना (सं.रा. अमेरिका)

पूरब से उदित होता तथा पश्चिम में अस्तांचल पर सूर्य…ये प्रकृति के सबसे सुन्दर, सुलभ तथा मनोहारी दृश्य हैं। घटित तो ये प्रतिदिन होने हैं पर आज के मशीनी मानव की फ्लॉपी डिस्क में इन लम्हों के लिए शायद ही कोई जगह हो। 

सूर्योपासना का अनुपम लोकपर्व छठ बस एक कर्मकांड या रीति-रिवाज़ भर नहीं है, यह तो प्रकृति से अपने जुड़ाव पर पुनर्विचार करने का पावन अवसर है। यह अवसर है जीवन के उस शाश्वत सत्य को समझने का कि जैसे प्रकृति में उषा और प्रत्युषा के बीच संतुलन बना रहता है वैसे ही जीवन में सुख-दुःख तो लगे रहते हैं- मानव का तो काम है बस सुखभरे पलों का आनंद ले, दुखभरे पलों को विस्मृत कर सदा गतिमान बने रहना। ठहराव प्रकृति का स्वभाव नहीं… भला नदी भी कहीं रूकती है क्या?

बिहार, नेपाल तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जानेवाला यह त्यौहार भले ही आंचलिक क्यों न हो, इसकी जड़ें मानव इतिहास के प्रथम ग्रन्थ वेदों में निहित हैं। षष्ठी तिथि खगोल-विज्ञान के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। छठ पर्व पूर्णतया वैदिक तथा वैज्ञानिक है। 

अमिनेष जी के भेजे गये ये सजीव चित्र जाने-अनजाने में जेहन में पूर्व की स्मृतियों का कोलाज़ तैयार कर रहे हैं।  दिमाग फ्लैशबैक में जा रहा है और याद आ रही हैं वो छोटी-छोटी मीठी-मीठी बातें … साल के बाकी दिनों में कचरे से भरा रहने वाला वो छठ घाट जो हर साल बस इस महापर्व के आगमन की बाट जोहता रहता है.…कि कब छठ आये और उसकी सफाई हो। फलप्राप्ति की आस में धरती पर लेटकर दंड देते छठ घाट पहुँचते लोग।  माथे पर दउरा उठाये आते पुरुष तथा उसके पीछे नाक तक सिंदूर का आवरण किये महिलाएं। प्रशासन के लाख मन करने के बावज़ूद पटाखों का जमकर लुत्फ़ उठाते हम बच्चे। लाउडस्पीकर पर अनवरत जारी छठ के लोकगीत। और हाँ, हाथ जोड़े कमर तक पानी में खड़े श्रद्धालु .... अविस्मरणीय।
आज  सात समंदर पार बैठकर भी ये चीज़ें याद आ रही हैं। कुछ नहीं, बस अंदर बैठे मानव की अनुभूत चेतना है। सोचता हूँ क्या हमारी पीढ़ी इस अद्वितीय परंपरा के संरक्षण तथा निर्वहन की भूमिका भली-भांति निभा पाएगी?


आकाश कुमार जीवन मैग के प्रमुख संपादक तथा सम्प्रति YES कार्यक्रम के तहत अमेरिका में भारत के युवा राजदूत हैं। बिहार के मोतिहारी से आते हैं तथा फिलहाल माउंटेन व्यू हाई स्कूल, मेसा (एरिज़ोना) में कक्षा बारहवीं के छात्र हैं।







फोटो क्रेडिट्स- अमिनेश आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक के छात्र तथा जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। अंकित कुंदन दुबे छात्र, स्वतंत्र टिप्पणीकार तथा जीवन मैग के टीम मेंबर हैं।


अमिनेष और अंकित के कैमरे ने छठ की तैयारी की कुछ और बेहतरीन तस्वीरें कैद कीं-





Saturday, 27 September 2014

डायरीनामा- "कहानी उम्र के उस पड़ाव की.."-





सोमवार, 20 जनवरी 2014

उन बूढ़ी आँखों मेँ किसी विजेता सी खुशी थी, उनके हृदय मेँ एक सफल जीवन का ज्वार उमड़ रहा था। थरथराते हाथ जिसकी कसावट हड्डियोँ से चिपकी थी और उन दंभ भरती रगोँ मेँ अचानक आया वो उमंग उनकी उभरी रगों से ज़ाहिर था। मेरे चेहरे और कंधो को ऐसे सहला रही थी जैसे वो आश्वस्त होना चाहती हों कि उसका जीवन कितना सफल है... अपनी थरथराती होँठो से निकले उनके शब्द उनकी इस खुशहाली के आँसु के साथ घुल गए -"अफसोस ना करइत जइह, एक से हजार हो गेली अब हमरा की चाहीँ"। सरसो के फूलों की सुगंध हवा मे तैर रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी रागिनी ने अपनी पीली चुनर खेतोँ मेँ पसार रखी हो... दूर क्षितिज पर लाली इस बात का इशारा कर रही थी की उनकी ज़िंदगी की एक और शाम आने वाली है और इस संध्या में मैँ यह महसूस कर रहा था कि मैँ एक ऐसी धनी महिला के सामने बैठा हुँ और शायद ही यह मुकाम किसी की ज़िंदगी में आता हो...! वो किस्मत की धनी हैँ, वो उम्र की धनी हैँ, और इससे भी कहीँ ज्यादा वो उस परिवार की धनी हैं जिसकी जवां हो चौथी पीढी का हाथ थामे वो सहला रही हैँ। मेरे और उनके बीच एक शताब्दी का फासला हैँ, एक परंपरा, एक संस्कृति, एक सभ्यता, एक सोच का फासला हैँ...लेकिन ऐसा जान पड़ा कि जैसे वो मुझे सदियोँ से पहचानती हो। ऐसा नहीँ कि मैँ उनसे पहले नहीँ मिला लेकिन शायद उन्हेँ एहसास हैँ कि यह मुलाकात आखिरी होगी। वो मेरे दादी की माँ, पिता की नानी और ना जाने कितने गंगा की वो गोमुख हैँ। "हमरा परिवार ऐतना बरका है कि सब लोगन से घर भर जाई, तोहनी सके देख ले लिएई अब हमरा कौन शौक है अब चलता चल जबई, तु स निम्मन से रहीए।" जैसे उनके भावोँ को अब शब्द नहीँ मिल रहे हो कि कैसे ज़ाहिर करे कि उनके जिँदगी मे अब कोई कमी ना रह गई, वो हर किसी को अपनी कहानी सुनाना चाहती हैं। वक्त के पन्नों में  उसे लिख देना चाहती हैँ कि सदियोँ यह दास्ताँ सुनाई जाती रहे। अपने सफल ज़िंदगी को खटोली के चार पाँव पर टिका वो अपनी दास्तां सुनाती रही और मैँ सुनता रहा। उनकी झुर्रियाँ जैसे उनके तमगे हो जो हर जीत पर वक्त ने उन्हेँ नवाजा हो। शायद यह मुलाकात उनसे आखिरी हो...कि कल को सरसराती हवा में उनकी यह सादगी कहीँ खो जाएगी उनकी साँसेँ खेतोँ के सुगंध में कहीँ घुल जाएँगी....और आत्मा उन्मुक्त परिंदों सा क्षितिज की ओर उड़ जाएगा.....तब वो याद की जाएँगी कि उन जैसा कोई ख़ुशनसीब ना था, उनके बिना यह परिवार मुमकिन ना था।



(डायरी के पन्नों से)


(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)
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Monday, 8 September 2014

दिल बनारसिया-2- रामनगर की रामलीला- अमिनेष

"दिल बनारसिया" श्रृंखला कि अगली कड़ी में- "रामनगर की रामलीला"

"कइसन घरनी ,केकर घर नेमी चललन रामनगर.."
उक्त पंक्ति बनारसी लहजे की एक नुमाइंदगी भर है जो रामलीला की महत्ता को दर्शाती हैं ...बनारस का दिल लंका मे बसता है...लंका वो जगह है जहाँ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का सिंहद्वार स्थित है और जहाँ से एक रास्ता गंगा पार रामनगर की हवेली को जाता है। मैंने ताकीद की आख़िर इस जगह को लंका क्यूँ कहा जाता है? यह नाम काशी की उस परंपरा की देन है जिसमें गंगा पार रामनगर को अयोध्या तथा गंगा इस पार इस जगह को रावण की लंका मानकर एक खुले विशाल थियटर के रूप मे प्रयुक्त कर काशी नरेश हर शारदीय नवरात्र के उपलक्ष्य मे रामलीला का आयोजन करवाते थे। वक्त के साथ यह महत्वाकांक्षी आयोजन सिर्फ रामनगर तक ही सिमट गया और लंका नाम लोगो के जेहन मे बस गया। 
 
(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। अमिनेष मूलरूप से बिहार के हाजीपुर से सम्बन्ध रखते हैं और जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं।)
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Tuesday, 2 September 2014

Club Activities June-July 2014


From Jeevan Mag 6

Sunday, 24 August 2014

Debate: Israel-Palestine conflict: Parvez Alam & Aminesh Aryan

The Big Debate: Israel-Palestine conflict

In the name of self-defense     
                                   -Parvez Alam


On 12th June 2014, Israel accused Hamas of kidnapping 3 Israeli teens in Gush Etzion, west bank of Gaza. In return they arrested 530 Palestinian citizens. Israel launched a heavy air-strike on Gaza in the name of 'Defending itself' and then their blood-thirsty troops entered Palestinian land murdering everyone they get in the way. They call it self-defense. They defended themselves by murdering 2000 civilians including 500+ children till now. What an appreciable self-defense it is? They're accusing Hamas of killing their 'innocent civilians ' who're living on looted lands of Palestine since 1948. Was the burning of thousand villages then a pre-act of self-defense? Because Hamas wasn't even in existence back then. Maybe possible. And talking about ruthless killing perhaps butchering of people on streets, in hospitals, in mosques, ambulances etc. is not new for the people of Palestine. They've to be ready for the worst every morning they wake up.

The world esp. the western nations have funded Israel in their bloody act of killing innocents following the theory of Zionism which is itself discarded by most of Jews. And after every such massacre of thousands of Palestinians they say they're willing to set up truce, truce on what price?                                                                       


Palestinians don't want truce, they want their land back, they want to live in their country without any fear of getting slaughtered any minute, and they want to see their kids grow playing instead of getting bombed in the schools, playgrounds, beaches. Can anyone answer why Palestine is not allowed to keep an army of itself like any other country? And that's the reason they're fighting.That's the reason Hamas is fighting. That's the reason PFLP (People's Front for Liberation of Palestine) & Maoist party of Palestine is fighting.They're not terrorists as branded by west controlled media but they're freedom fighters for their citizens. They're fighting for the liberation and freedom of their land, which belongs to them only. They may not have as heavy artillery as Israel but they'll win because people's resistance can never be defeated.What could be a better example of this than Vietnam?                                                                


The world's 'SUPERPOWERS' maybe supporting Israel but people aren't. The world has never seen so many protests across the globe in recent times. Many celebrities like Ronaldo, Mesut ozïl, Al puccino, John Berger, Nobel laureate Tutu and many to add on the list are standing for the truth, for the freedom of Palestine.


The BDS movement has started to show its effects. According to reports, Israel's economy has lost 950 million dollars in last 2 months. But there's still a long way to go, we need to continue the boycott and Palestine needs to keep their resistance going. They'll win, sooner or late. Because they have nothing to lose now and a message to all the martyrs, "your sacrifice will never be wasted; the day is near when your future generation will breathe freely ".       

And for all the supporters of Israel ,
America's intellectual Noam Chomsky's words seems perfect , " People who call themselves supporters of Israel are actually supporters of its moral degeneration and ultimate destruction." 


One of my Palestinian friend said , " First they said , Palestinian fight like heroes , now they'll say , heroes fight like Palestinians. " 



(Parvez Alam is a student of Class XII Science at Jamia Millia Islamia, New Delhi. Basically from Chhapra in Bihar, Parvez subscribes to communist ideology.) 
Facebook: www.facebook.com/parvez16mb




आतंक के विरुद्ध इज़रायल की मुहिम
                                     

 -अमिनेष आर्यन


इज़रायल दुनिया का एकमात्र यहूदी राष्ट्र है, ये वो यहूदी हैं जो सदियों दुनिया द्वारा सताये जाते रहे हैँ। पूर्व मेँ इनके पवित्र मंदिर दो बार रोमन साम्राज्य द्वारा ध्वस्त कर दिए गए और इनपर असभ्य होने का आरोप लगा, ईसाई इन्हेँ नीच मानते थे और इस तरह यहूदियों को यूरोप से निकाल दिया गया। मध्य काल मे अरब प्रायद्वीप मेँ इस्लाम के साथ संघर्ष ने यहूदियों को अपने ख़ुद के राष्ट्र के लिए सोचने को मज़बूर कर दिया। कालांतर मे हिटलर के नाज़ीवाद ने किस तरह यहूदियों का कत्लेआम किया , जिसे दुनिया आज महाविध्वंस के नाम से जानती हैँ। यहूदियों के मातृ स्थान उनसे छीन लिए गए और उन्हेँ दर-दर भटकने के लिए मज़बूर किया गया। वक़्त के साथ यहूदियों ने भारत, अमेरिका जैसे नवसृजित देशों मेँ शरण ली। महान साइंटिस्ट अल्बर्ट आइंस्टाइन भी उनमें से एक थे जो हिटलर की नज़रों से बच कर अमेरिका चले गए। जेरुसलम को यहूदी अपना घर मानते हैँ, यहीँ पर उनका वो पवित्र मंदिर था। यह स्थान इस्लाम के लिए भी पवित्र है पैगंबर हजरत मोहम्मद यहीँ से स्वर्ग की यात्रा पर गए थे और संयोगवश ईसा मसीह का जन्म भी यहीँ हुआ इसलिए यह ईसाईयत का भी पवित्र स्थान हैँ। दोनों ही धर्म संसार के विभिन्न क्षेत्रोँ मे प्रसारित और प्रतिष्ठित भी हैँ जबकि यहूदियों को अपने देश के लिए सदियोँ लड़ना पड़ा तीन धर्मयुद्ध हुए और इस तरह जेरुसलम धर्मो का रणक्षेत्र बन गया। अंत में वर्ष 1948 में इज़रायल के नाम से एक अलग यहूदी राष्ट्र की घोषणा की गई और जेरुसलम इज़रायल राष्ट्र की राजधानी बनी। वक़्त के साथ इज़रायल ने समृद्धि-संपन्नता-विकास-प्रतिष्ठा-शक्ति हासिल कि और मध्य-पूर्व एशिया का शक्तिशाली देश बन कर उभरा। यहाँ तक कि वो युद्ध हथियारों के सबसे बड़े निर्यातकों में से है। आज जब आतंकी हमले के ख़िलाफ उसने कारवाई शुरू कि तो दो-दो विश्वयुद्ध लड़ चुके देश मानवता कि दुहाई दे रहे है? क्या अपनी आत्मरक्षा करना गलत हैँ? अपनी गजब की रक्षात्मक प्रणाली से दुश्मन के हमलोँ को नाकाम कर अगर वो अपने नागरिकों की रक्षा कर सकने में सक्षम है तो क्या वो गलत है? या फिर वो इसलिए गलत हैँ कि इज़रायली नागरिक इस युद्ध मे हताहत नहीँ हो रहे? हमास-इज़रायल युद्ध कोई आपसी रंजिश नहीँ बल्कि उस परंपरा की बानगी है जिसमेँ धर्म को राष्ट्र का आधार माना जाता हैँ और उस राजनीतिक साजिश की देन जिसमेँ इज़रायल से अलग एक फिलिस्तीनी राज्य की घोषणा की गई। ताज्जुब की बात देखिए संयुक्त राष्ट्र जैसे भारी-भरकम जमघट ने जेरूसलम को ही फिलिस्तीन कि राजधानी स्वीकार किया जो इज़रायल की अधिकारिक राजधानी हैँ। आख़िर क्यूँ? तब तो ऐसा लगता है जैसे यह युद्ध उपहार स्वरूप दिया गया हो । दुनिया बखूबी जानती हैँ कि गाजा पट्टी के क्या हालात हैँ गाजा पट्टी पर नियंत्रण रखने वाली हमास ने एक अलग इस्लामिक स्टेट के नाम पर  जो आतंक फैला रखा है वो उस इलाके कि बदकिस्मती है कि उसकी अपनी ही निर्वाचित सरकार उनका विकास नहीँ चाहती, इज़रायल पर बार-बार हमले कर हमास ने यह साबित किया है कि पवित्र इस्लाम के नाम पर तुच्छ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए पूरे फिलिस्तीनी राज्य को युद्ध मेँ झोँकना चाहते है। यह उसी तरह है जैसे अफगानिस्तान मे तालिबान और गुलाम कश्मीर के अलगाववादी आतँकी। इसलिए इज़रायल आतंक के ख़िलाफ युद्ध कर रहा हैँ ना कि फिलिस्तीन के खिलाफ। इस बात का यह सबूत है की उसी फिलिस्तीन के वेस्ट बैँक इलाके जो हमास के शासन से मुक्त हैं और जहाँ शान्ति छाई है। भारत- इज़रायल संबंध भारत को रक्षा क्षेत्र मे सक्षम बनाती हैँ। ऐसे मे काँग्रेस चाहती है कि हम इज़रायल का विरोध करें जबकि उसी की सरकार में इज़रायल के साथ कई अहम रक्षा समझौते हुए। हमारी अंतर्राष्ट्रीय  नीति भले ही शांतिमूलक हो लेकिन भारत का इस मामले में तटस्थ बने रहना ही लाभदायक हैँ।

(अमिनेष आर्यन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र स्नातक‍ प्रथम वर्ष के छात्र हैं। मज़ेदार बात यह है कि मूल रुप से बिहार के हाजीपुर से संबंध रखने वाले अमिनेष भी कम्युनिस्ट विचारधारा में विश्वास रखते हैं। अमिनेष ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते तथापि नास्तिक हैं।)

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