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Tuesday, 20 January 2015

अच्छे दिन कब आयेंगे?

सरकार बदलने से नहीं बल्कि विचार बदलने से अच्छे दिन आते हैं| अपने दिल पर हाथ रख कर पूछिये कि  क्या अब किसी लड़की के काले रंग और छोटी नाक के कारण उसका रिश्ता नहीं ठुकराया जायेगा? क्या दहेज़ की आग में अब कोई बेटी नहीं झुलसेगी ? क्या किसी को प्यार कर उसे अपना लेने की हिम्मत रखने वाली लड़की को लोग अब गिरी हुई नज़रों से नहीं देखेंगे? क्या विमाता के वचन अब मधुर हो जायेंगे? क्या ''डोम'' के छू जाने पर माँ अब बच्चों को नहलाकर गंगाजल नहीं छिटेंगी? क्या गाँव के ''चमार'' और ''दुषाध'' अब भूमिहार और ब्राह्मण के साथ एक ही लाइन बैठकर भोजन कर पाएंगे? क्या राज ठाकरे ''बिहारियों'' को अब गाली देना बंद कर देगा? क्या क्षेत्र के नाम पर अब लोगों को खदेड़ा नहीं जायेगा? क्या धर्म के नाम पर दंगे अब नहीं होंगे? क्या मंदिर-मस्जिद की राजनीति अब नहीं होगी? अगर इन सब का उत्तर हाँ है तो यक़ीनन जश्न जायज है| 

 
लेकिन अगर शक की कोई गुंजाइश भी है तो क्या फर्क पड़ता है की सरकार ''मनमोहन सिंह'' चलायें या ''टोबाटेक सिंह'' | ये सभी यक्ष प्रश्न आज समाज के सामने सुरसा के समान मुंह खोले खड़े हैं| कोई भी सरकार कानून बना सकती है, जन-मानस को प्रोत्साहित कर सकती है,जागरूकता फैला सकती है, जमीनी स्तर पर उसे अमली-जामा पहनाना किसी सरकार के बस में नहीं है| दहेज़ प्रथा, यौन शोषण, जातिगत भेदभाव के खिलाफ़ कानून तो दो पीढ़ी पहले से मौजूद हैं फिर भी कालजयी शिरीष की भांति यह आज भी फल-फूल रहे हैं| सच कहूँ तो दहेज़ की रकम तो महंगाई से ''डायरेक्टली प्रोपोसनल'' भी हो गई है| आज फिर इस देश को महात्मा गाँधी की जरुरत आन पड़ी है, जो जाकर लोगों से यह कह सके की ''हे पुत्र रंग, धर्म, जाति , लिंग, क्षेत्र और राष्ट्र पर मनुष्य का कोई वश नहीं होता| उसे अपने पैदा होने के स्थान, जाति, धर्म और लिंग संबंधी कोई अधिकार ब्रह्मा ने नहीं दिए हैं, इसीलिए इस आधार पर भेदभाव उचित नहीं है''|

देश की सरकार हमारी सीमाएं सुरक्षित कर सकती है| सरकार बुनियादी ढ़ांचे को मजबूत बना सकती है| सरकार शेष दुनिया से हमारे रिश्तों का जिम्मा ले सकती है| कोई भी सरकार हमारी विकृत मानसिकता को दकियानूसी विचारों को, अंधी प्रथाओं को तथा पितृसत्तात्मक समाजों को नियंत्रित नहीं कर सकती| इन सभी विचारों,प्रथाओं तथा संस्कारों के विधायिका भी हम हैं, कार्यपालिका भी हमीं हैं और न्यायपालिका भी| अतः अब अपने दिल के संसद में एक विधेयक पास कर लेना कि लिंग, धर्म, जाति और क्षेत्र के नाम पर भेदभाव नहीं करेंगे तभी अच्छे दिन आयेंगे| 


(चित्र साभार: एबीपी न्यूज़)

संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.


Friday, 12 December 2014

मीडिया ट्रायल- संतोष


लोकतंत्र का चौथा स्तंभ 'संवादपालिका' आज खुद कटघरे में खड़ा है| और आरोप है कि इसने 'संवाद' जो कि इसके अस्तित्व की बुनियाद है, से छेड़खानी की है| निरंतर और चौतरफा लगे आरोपों ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है | और लोकतंत्र के लिए इससे बुरा क्या हो सकता है कि मीडिया संदेह के घेरे में हो | यह और भी खतरनाक तब लगता है जब हम इसकी तह तक जाते हैं | मनोविज्ञान के अनुसार कंडीशनिंग का असर मनुष्य पर जीवनपर्यन्त रहता है | बाल्यावस्था से ही हम सूचनाओं से घिरे होते हैं | सूचना से विचार आते हैं, विचार से नजरिया बनता है, नजरिया से अवधारणा बनती है और अवधारणा से व्यक्तित्व का विकास होता है | तो यह साफ दिखता है की एक व्यक्तित्व के विकास में सूचना का कितना महत्त्व है | उदहारणस्वरुप आपने अपने होने वाले पति/पत्नी को नहीं देखा है, विभिन्न सूत्रों से आपको पता लगता है की वो दिखने में बहुत ही सुन्दर हैं,उनकी नाक लम्बी है, रंग गोरा है और वो अच्छा नाचते व गाते भी हैं | तो मन ही मन हम उस व्यक्ति की एक इमेज बना लेते हैं कि वो ऐसे दिखते होंगे | और अगर सूचना ही गलत हो तो ..... ?

शरीर की व्याधि का उपचार तो संभव है, किन्तु इस सूचना तंत्र के बीमार होने से जो मानसिक महामारी फैल रही है यह अनुपचारित है | यह देश के युवाओं को, और विशेषत: उन युवाओं को जो मीडिया में करियर बनाना चाहते हैं उन्हें, गुमराह करती है | छात्र जीवन में हर मीडिया पर्सन को 'एथिक्स ऑफ़ मीडिया' पढाया जाता है फिर क्यों नहीं वो उसका अनुसरण करते हैं? क्यों हमारे यहाँ  'तरुण तेजपाल' जैसे पत्रकार पैदा होते हैं ? क्यों हम पर 'पेड मीडिया' का टैग लगाया जाता है? क्यों हम पर 'बायस्ड' होने का आरोप लगाया जाता है? जब इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढते हैं तो हमारे नैतिक मूल्य और शिक्षा व्यवस्था ही प्रश्नों के घेरे में आ जाती है |
एक पत्रकार को शुरू से ही यह घुट्टी पिलायी जाती है कि विचारशून्य बनो | स्मरण रहे की एक विचारशून्य व्यक्ति कभी दूसरों के विचारों की कद्र नहीं कर सकता | सच, सच ही होता है तथा झूठ, झूठ ही | अगर एक पत्रकार सच को सच बता दे तो अपने कर्तव्य का निर्वाह न करने का आरोप कहाँ तक जायज है ? और इस कर्तव्य का निर्धारण आखिर करता कौन हैं ? क्या वही किताबें और कानून जो आज से 40-50 साल पहले लिखी गई थी | उस समय के हिंदुस्तान और आज के इंडिया में बहुत बदलाव आ गया है | आज हमारा एक घोटाला तो कई देशों के बजट से भी अधिक होता है | आज देश की सीमा से अधिक तनाव तो देश के शहरों में होती है | आज जंग से अधिक कुर्बानियां तो दंगो में दी जाती है | आज चोर-डाकुओं से अधिक खौफ तो पुलिसवालों का होता है | आज संसद से अधिक शालीनता तो सड़क पे दिखती है | फिर हम कैसे आशा कर सकते हैं कि बदलाव की इस बयार से मीडिया अछूता रह जायेगा ? निसंदेह आर्थिक पहलुओं ने मीडिया के 'एथिक्स' को प्रभावित किया है परंतु इसकी भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता | आज इक्कीसवीं सदी के भारत में कोई भी संस्थान, समाज या व्यक्ति विचारशून्य नहीं हो सकता, और अगर है तो कम से कम पत्रकार न बने |
अब वक्त आ गया है उस अध्याय को पाठ्यक्रम से हटा देने का जिसकी उपयोगिता बदलते समय में क्षीण हो गई है | अब वक्त आ गया है नई नीतियों के निर्धारण का | अब वक्त आ गया है आत्मचिंतन का | अब वक्त आ गया है खुल कर बहस करने का | हर नीति, कानून, और बहस के अंत में व्यक्ति ही होता है इसीलिए यह सर्वाधिक आवश्यक है कि वह अपने विवेक का इस्तेमाल करे | एक पत्रकार को सच कहने और पूछने का साहस होना चाहिए | सूचना क्रांति के इस दौर में कुछ भी छुपा नहीं है तो फिर इस "पारदर्शी नकाब" की क्या जरुरत है ?
'लोकतंत्र के प्रहरी' को भी अपने नैतिक मूल्यों को समझना होगा, तथा 'ब्रेकिंग न्यूज', 'फ्रंट पेज' और 'लुटियन जोन' की पत्रकारिता से बचना होगा अन्यथा दिन - प्रतिदिन अपनी विश्वसनीयता खोता जायेगा | उसे वंचितों की आवाज बुलंद करनी होगी, उसे भ्रष्टाचारियों को आईना दिखाना होगा और उसे बदलते भारत का गवाह बनना ही होगा |

संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Thursday, 27 November 2014

देवताओं के एजेंडे (व्यंग्य)- संतोष



इवनिंग वाकिंग का भी अपना ही मज़ा है| साथ में अगर गप्पें मारने वाले मित्रगण हों तो समय से पहले ही चारों चाँद निकल आते हैं| होस्टल से कुछ ही आगे निकला की मेट्रो स्टेशन के पीछे “कृष्णभक्तों” की टोली दिखाई पड़ी| भक्तों की श्रध्दा देखिये आस-पास मुरली मनोहर की कोई प्रतिमा भी नहीं है ,पर हर किसी ने दिल में ही प्रभु को बसा लिया लगता है| ऐसा प्रतीत हो रहा था की वृन्दावन ही पहुँच गया हूँ| हर कोना कृष्णमय हो गया था| कृष्ण पेड़ की डाल पर बैठा करते थे ,पर कांटेदार पेड़ होने के कारण चबूतरों व सीढियों को ही यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा था| दूसरों की ख़ुशी से इंसान खुश होता है और दूसरों के दुःख से दुखी पर आज, अभी तक भगवन की भक्ति न मिलने के कारण दूसरे भक्तों से ईर्ष्या हो रही थी| आगे बढ़ते ही कक्कड़ की दुकान पर शिवभक्तों की मंडली नजर आई | डमरू और त्रिशूल के अलावे सब कुछ था भक्तों के पास| भक्तों की भीड़ व भक्ति इतनी की सब एक साथ अगर कैलाश पर्वत पहुँच जाय तो कैलाश का बर्फ भी पिघल जाय| मन ही मन सोचा की कैसे लोग अपने इष्टदेव का चयन करते होंगे? स्वत: ही संभावित उत्तर सूझा , शायद नेताओं की तरह भगवानों के भी अपने –अपने एजेंडे होते होंगे| जिसे जिनका एजेंडा पसंद आए उन्हें अपना लो| अगर ऐसा ही हो तो किनका एजेंडा सर्वाधिक लोकप्रिय होगा? जब वहां से आगे निकला तो दृश्य देख कर दंग रह गया| दिल्ली की इस कड़कड़ाती सर्दी में सड़क के किनारे कोई कपड़ों का एक चादर ओढ़े तो कोई अपनी खाल की चादर ओढ़े सोये थे| शायद इंद्रदेव अपना एजेंडा तय नहीं कर पाए थे| एक भी भक्त अपने पक्ष में न आते देख क्रोधवश हारे हुए नेता की तरह रात को वर्षा करा दी| तनिक भी न सोचा की ये बेचारे कहाँ जायेंगे| छप्पन करोड़ देवी-देवताओं में से किसी का भी एजेंडा अगर इन सड़क पर रात गुजारने के लिए नहीं है तो इन नेताओं से भला क्या आशा की जाये|
संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Tuesday, 18 November 2014

दूरदर्शन की सौतन- संतोष

एक समय था की जब दूरदर्शन ‘’सरकार’’ की छवि को लेकर उतनी ही चिंतित रहती थी जितनी की एक पत्नी अपने पति के लंचबॉक्स को लेकर | पूरे दिन निजी क्षेत्र की मीडिया द्वारा जब सरकार को पत्थर मारा जाता तब शाम को यह उस पर मरहम पट्टी का काम करती थी और धीरे से गुनगुनाती रहती ......
''बहुत रंजूर है ये, ग़मों से चूर है ये
खुदा का खौफ़ उठाओ, बहुत मजबूर है ये
क्यों चले आये हो बेबस पे सितम ढाने को
कोई पत्थर से ना मारे .........''


पहले सौतन का नाम ही पत्नी को जलाकर राख कर देती थी | उत्तर आधुनिक युग में अब सौतन की परिभाषा भी बदलने लगी है | अब की सौतने ख़ुशी- ख़ुशी साथ रहना पसंद करने लगी हैं | दूरदर्शन की सौतन भी अब सहेली बन गई है| दूरदर्शन की तो फिर भी कुछ सीमाएं हैं जैसे सुबह रंगोली, शाम को क्षेत्रीय प्रसारण, रात को अन्य विशेष कार्यक्रम इन सब की वजह से इसे उतना स्नेह नहीं मिल पता जितना की ये सौतनें इठला-इठलाकर लुटती रहती है | कभी प्रेमी के कुरते की तारीफ़ से तो कभी दाढ़ी के कलर पर बहस करा कर तो कभी ''सासु माँ'' का साक्षात्कार दिखा कर|

एक अलग नजरिये से देखें तो इन सब ने मिलकर दूरदर्शन का काम आसान ही कर दिया है , बेचारी अब कहाँ इन नवयुवतियों से रेस लगाती फिरे| और कलमुंही ये सौतनें........ये तो बस साबित कर देना चाहती हैं की वाकई ''हर सफल पुरुष के पीछे एक प्रेमिका का हाथ होता है"| ये जता देना चाहती हैं की ये जो तख्तो-ताज तुम्हे मयस्सर हुई है वह मेरे ही प्रेम, त्याग, और समर्पण का परिणाम है| दूरदर्शन बेफ़िक्र हो कर तमाशा देख रही है | इसे पता है की दो चार हसीन शाम गुजर जाने के बाद वापस तो इसे मेरे ही आँचल तले आना है| मगर वो कहते हैं न की प्यार अगर एकतरफा भी हो तो यादों को कौन मिटा सकता है ? फिर भी क्या खूब जिया है इस वक़्त को इन सौतनो ने! नये-नये सीरियल पुरे दिन दिखाएँ हैं कुछ का नाम इस प्रकार रखा जा सकता है ''कभी नरेन्द्र कभी मोदी'', ''ससुराल मोदी का ''. ''मोदी का घर प्यारा लगे'', मोदी बधू'', ''सपने सुहाने मोदी के'', ''नरेन्द्र मोदी का उल्टा चश्मा'' तथा ''क्योंकि मोदी भी कभी C.M था''!
125 करोड़ की आबादी में दुर्भाग्यवश औसतन 125 चेहरे को मीडिया तरज़ीह देती है| दस-पंद्रह फ़िल्मी कलाकारों, दस-पंद्रह उद्योगपति औसतन सत्तर-पचहत्तर नेताओं को फिर ब्रेक में जाने के बाद अगर समय बच जाए तो उन बदनसीबों को भी दिखा देते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है या जो किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं और दुर्भाग्यवश अगर रैली का दिन ठहरा तो करमजले को वो भी नसीब नहीं होता| 


संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Tuesday, 11 November 2014

ब्रॉडकास्टिंग से नैरोकास्टिंग की ओर

ब्रॉडकास्टिंग का मतलब अगर प्रसारण है तो नैरोकास्टिंग का मतलब क्या होगायही सवाल सौ टके का हैआखिर नैरोकास्टिंग का कांसेप्ट है क्याइसकी जरूरत क्यों पड़ीऔर इसका भविष्य क्या हैहम हिन्दुस्तानी सबसे पहला सवाल जो पूछते हैं वह भविष्य से ही जुड़ा होता हैइतिहास गवाह है टेलीविजनमोबाइलकंप्यूटर आदि के आगमन पर पहला सवाल यही पूछा गया था. 2005 में रेडियो प्रसारण में एक नई पहल अस्तित्व में आई जो “सामुदायिक रेडियो” के नाम से जाना जाता है. सामुदायिक रेडियो की अवधारणा बाकी के कॉमर्शिअल चैनलों और आकाशवाणी से बिल्कुल अलग है. इसका सिद्धांत “समुदाय के लिएसमुदाय कासमुदाय के साथ” होता है. यह एक मंच है उन लोगों का भी जिनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हो पायाजिनके गीत किसी ने नहीं सुनेतथा जिनका ज्ञान किसी ने नहीं बाँटा. यह माध्यम केवल संचार का ही नहीं बल्कि व्यवहार तथा अस्मिता का भी है. समुदाय ही इसकी पूंजी है और समुदाय का कौशल विकास करना इसका निवेश.  




तो आखिर समुदाय क्या हैभूगोल की माने तो किसी स्थान विशेष या क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोग एक समुदाय का निर्माण करते हैं. लेकिन हर जगह यह भी मान्य नहीं होता है. समुदाय जातीजनजाति का भी हो सकता है. समुदाय एक भाषा बोलने वाले का भी हो सकता है. एक तरह के रीति-रिवाज तथा मान्यताओं को माननेवालों का भी समुदाय हो सकता है. कम्युनिटी रेडियो की अवधारणा के अनुसार जितने दूर के लोग उस रेडियो की आवाज को स्पष्ट सुन सकते हैंउसका समुदाय बन जाते हैं. यहाँ समुदाय का निर्माण श्रोता तक पहुँच से तय होता है. लेकिन आज डिजिटल युग में जहाँ रेडियो इंटरनेट के माध्यम से पूरी दुनिया में सुना जा सकता है तो इस परिभाषा पर पुनः सोचने की जरूरत जा पड़ती है.
 
कम्युनिटी रेडियो वर्तमान संचार के तरीकों में विश्वास नहीं रखता. इस अवधारणा में एजेंडा समुदाय के द्वारा तय किया जाता है. कार्यक्रम समुदाय के लोगों के अनुसार होता है. भाषा लोगों के बोलचाल की होती है और बोलने वाला समुदाय का ही सदस्य होता है. सही मायने में कहा जाये तो यह अपनी पहचान होती है अपनी आवाज होती है. कम्युनिटी रेडियो क्षेत्रीय संस्कृति की झांकी प्रस्तुत करता है. क्षेत्रीय खान-पानपहनावा-ओढ़ावाभाषा-बोलीरहन-सहन तथा आचार-विचार को मंच प्रदान करने वाला यह अपने आप में एक अनोखा माध्यम है. देश में कई बोली लुप्त हो गई और कई लुप्त होने के कगार पर है. ऐसे में सामुदायिक रेडियो एक संजीवनी बन कर सामने आया है.

दुनिया के कई देशों में सामुदायिक रेडियो अपना परचम लहरा रही है. अफ्रीकानेपालऑस्ट्रेलियातथा श्रीलंका में तो यह अपनी सफलता की कहानी लिख कर स्थापित हो चुका है. हर जगह इसका स्वागत किया जा रहा है. यूनेस्को जैसी संस्था इसे अपना पूरा समर्थन दे रही है तथा इसके विकास को प्रतिबद्ध है. तो अब सवाल यह आता है की इस अपेक्षाकृत कम पहुँच वाले रेडियो की आवश्यकता क्यों पड़ीजिस देश में आकाशवाणी की पहुँच 92% से अधिक क्षेत्रों तक तथा 99% लोगों तक है वहां इसकी जरूरत क्या है?निःसंदेह ऑल इंडिया रेडियो देश की सबसे बड़ी पहुँच वाला संचार तंत्र है. उसके पास विशाल कंटेंट और कंटेंट बनाने वाले हैं. देश के जाने-माने वाचकउद्घोषक और कलाकार आकाशवाणी से जुड़े हैं. इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद आकाशवाणी वह बात नहीं कह पाती जो हम सुनना चाहते हैं. इस विशाल जन समाज को आकृष्ट करने के कारण वह उन चीजों तक नहीं पहुँच पाता जो हम जानना चाहते हैं. नामचीन हस्तियों कि भीड़ के कारण वहां हमारे लिए जगह ही नहीं बन पाता. वह कोई नहीं सुन पाता जो हम सदियों से सुनाना चाह रहे हैं. इन सभी व्याधियों का उपचार लेकर आया कम्युनिटी रेडियो. उसके पास हमारे लिए जगह भी है और समय भी क्योंकि वह हमारे लिए ही बना है.



संतोष कुमार 

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.  

Saturday, 17 May 2014

मर्दानगीहरण- संतोष

यह लेख जनसत्ता के "समांतर" में जीवन मग के वेब पता के साथ छपा है...



‘’मर्द के सीने में दर्द नहीं होता’’ इस जुमले को सुना कर न जाने कितने रोते बच्चों को चुप करा दिया गया तो कितनों ने चुपचाप बेवफ़ाई का विष पी लिया|

क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में चल रहे प्रोजेक्ट ‘’डीकंस्ट्रक्टिंग मैस्कुलैनिटी’’ के तहत सर्वे के दौरान छात्रों ने पाया की 70 पुरुषों फीसदी का मानना है की मर्द वही जो दूसरों को दर्द दे, जो रोये नहीं रुलाये, जो ताकतवर हो, , जो रूपये कमा कर लाये आदि| यह अत्यंत ही चिंता का विषय है की आधी मानव जाति को अपने होने का मतलब ही स्पष्ट नहीं है| उसके कर्तव्य तथा उसके दायित्य ओझल हो गए हैं|

अगर अपने अतीत में झांके तो आप पाएंगे कि किस तरह परिवार में ही मर्द बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है| छोटे लड़कों को खिलौने के रूप में मोटरसाईंकल, पिस्टल कार, घोडा आदि दिए जाते हैं| वहीँ लड़कियों को गुड़िया-गुड्डे का ब्याह रचाने का खेल सिखाया जाता है| लड़कों को बाहर खेलने जाने की अनुमति होती है परन्तु लड़की तो खेल ही नहीं सकती| गाँवों की स्थिति तो और भी बदतर है| एक ओर जहाँ पुरुष कम वस्त्र  पहन कर पूरे गाँव का चक्कर लगा आते हैं वहीँ महिलाओं के सिर पर पल्लू न होना अल्हड़ता का पर्याय माना जाता है| एक छोटे लड़के को अगर पेशाब आता है तो वह सब के सामने वहीँ खड़े हो कर शुरू हो जाता है वहीँ एक छोटी लड़की भी ऐसा नहीं कर पाती है| आखिर 4-5 साल के लड़के-लड़कियों में यह फर्क कैसे आ जाता है? क्योंकि 5 साल की एक लड़की को यह 5 हजार से अधिक बार कहा जा चुका होता है कि तुम एक लड़की हो तुम्हे ‘यह’ नहीं करना चाहिए, तुम्हे ‘वह’ नहीं करना चाहिए| तुम पैर फैला कर मत बैठो, तुम तुम इतनी आवाज में मत बोलो, इतनी जोर की हँसी एक लड़की को शोभा नहीं देती आदि आदि|


"सीमोन द बउआर’’ लिखती हैं "लड़की पैदा  नहीं होती, बना दी जाती है|’’  माँ-बाप को जब अपने बेटियों पर अधिक लाड आता है तो प्यार से उसे ‘’बेटा जी’’ कह कर पुकारते हैं | उस वक्त नन्ही लड़की के कोमल मन पर क्या गुजरता है वो तो एक लड़की ही समझ सकती है| ये हालात केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं है दुनियां के रसूख देशों में भी मिले-जुले हालात हैं| अमेरिका में लड़की व लड़कों के लिए अलग स्टोर होते हैं| लड़कियों का कलर पिंक तथा लड़कों का ब्लू होता है| “मर्दानगी’’ एक असामाजिक तमगा है जो अधिक हिंसक, खूंखार व शासक होने पर दिया जाता है|


एक पुरुष सब कुछ बनना पसंद कर सकता है परन्तु ‘नामर्द’ बनना नहीं| उसके लिए नामर्द सबसे बड़ी गाली होती है| अमेरिका द्वारा बनाया गया इराकी बंधक अल-श्वेरी लिखते हैं - वो हमें बेईज्जत करने की कोशिश कर रहे थे, हमारी इज्जत हमसे छीनने की| हम आदमी हैं, वो चाहें तो हमें पीट ले| पीटने पर हम नहीं टूटते ....वो तो बस एक वार है .....लेकिन कोई भी आदमी अपनी मर्दानगी खोना पसंद नहीं कर सकता|


दुःख तो तब होता है जब मीडिया मर्दानगी को परिभाषित करने लगती है| उत्पाद को बेचने के लिए विज्ञापन के द्वारा दर्शकों को भ्रमित करती है| सेंट, शैम्पू और क्रीम के चमत्कारिक असर दिखाए जाते हैं| आज युवाओं को आत्ममंथन की जरुरत है| पार्टियों में दो पैग अधिक शराब पीना, सिगरेट पीना, ज्यादा से ज्यादा गर्लफ्रेंड बनाना मर्दानगी का सबब बनता जा रहा है| 



क्या महात्मा गाँधी मर्द नहीं थे? स्वामी विवेकानन्द मर्द नहीं थे? अगर मर्द बनना है तो इनकी राह पर चलना चाहिए| हर साल झगड़ा, बलात्कार तथा घरेलु हिंसा के हजारों मामले सामने आते हैं| इसका कारण कहीं न कहीं मर्दानगी से जुड़ा होता है जो हमें गलत तरीके से दिया गया है| हमें मर्दानगी के रुढ एवं गलत अवधारणाओं को मिटाना होगा तथा समाज को जागरूक करना होगा|अतः अब हमें 'मर्दानगी' को पुनः परिभाषित करना होगा|


---संतोष कुमार

'क्लस्टर इनोवेशन सेंटर’ 
दिल्ली विश्वविद्यालय |

(ये लेखक के अपने विचार हैं|)

Tuesday, 1 April 2014

घटकैती (व्यंग्य)- संतोष


 
बेटी की शादी के बाद चाचा जी को पता चल गया था की बेटी के पिता को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं| उन्होंने तय किया की अपने बेटे की शादी में बेटी वाले पक्ष को तनिक भी परेशानी महसूस नहीं होने देंगे| वह शुभ घड़ी भी ही गई| लड़का ऊँचे खानदान का था और उसमे भी बैंक की सरकारी नौकरी इसलिए आगंतुकों की लाइन लगी रहती थी| आख़िरकार एक लड़की की तस्वीर पसंद की गई| मेरा बैठक तो माने दूसरों के विवाह तय करने के लिए ही बन था| वहीं एक बार फिर कुर्सियां मंगवाई गई, नया बेडसीट बिछाया गया, शर्बत फिर चाय और बिस्कुट आने के साथ ही माहौल गंभीर हो गया| तपाक से लड़की के पिता के बगल में बैठे दिन में सज्जन दिखने वाले पुरुष ने बिस्कुट खाते हुए कहासमधी जी तो अब मुद्रा की बात हो जाय’’| चाचा जी ने कहा की मुझे एक रूपया भी दहेज़ नहीं चहिये| अगर आपको फिर भी देना ही है तो, 11 रूपया, एक जनऊ, और एक टुक सुपारी दे दीजिये मै प्रेम से रख लूँगा| सभी लोग अवाक् हो कर चाचा को देखते ही रह गए| पड़ोस के लोगों को डर लग रहा था कि बाराती के लिए भी कहीं मना कर दे, कितने दिनों से अरमान लगा रखा है| बेटी वालों को लग रहा था कि किसी ने उन्हें क्लोरोमिंट कैंडी खिला दी है| उन्हें कुछ समझ में नहीं रहा था| लगभग दस मिनट तक सब खामोश बने रहे| एक लड़का आया और खाली गिलास और प्लेट लेकर चला गया| थोड़ा आगे जाते ही उसने प्लेट में बचे सारे बिस्कुट पॉकेट में डाल लिए| अचानक लड़की के पिता ने कहासमधी जी घर पे गोरु को बछड़ा हुआ है, जल्दी जाना पड़ेगा सो अब आज्ञा दीजिये’’ मै फिर एक दो दिन में आकर आगे की बात फाइनल कर लूँगा| चाचा जी ने ख़ुशीख़ुशी सबको विदा किया|
दो महीने बाद एक फ़ोन कर चाचा ने देरी का कारण जनना चाहा| लड़की के पिता ने कहा जरुर आपके लड़के में कोई खराबी होगी, नहीं तो कौन आजकल 11रूपया और जनऊ, सुपारी में शादी करता है| मैंने अपनी बेटी की शादी कर दी चार लाख रुपये और एक मोटर साईकल दिया है अपने दामाद को| चाचा तो अब बन गए चौधरी| कुछ दिन बाद नए लोग आये  तो चाचा ने कहा 6 लाख रूपया और और एक अपाची लूँगा |अबकी बार ख़ुशीख़ुशी भैया की शादी हो गई|
अचानक मुझे ख्याल आया की इनोवेशन के लिए अभी हमारा समाज तैयार नहीं हुआ है| ये केवल CLUSTER INNOVATION CENTRE में ही संभव है||         

 
- संतोष
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र एवं चर्चित व्यंग्यकार हैं |)





साभार‍- जीवन मैग फ़रवरी मार्च २०१४ अंक
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A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan

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