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Saturday, 20 December 2014

अम्बेदकरवाद- राघव

बाबा साहब अम्बेदकर के महापरिनिर्वाण दिवस पर आज कुछ बुद्धिजीवियों के विचार सुनने का मौका मिला। यद्यपि बाबा साहेब के बारे में बहुत ज्यादा पढ़ा नहीं है मैंने, लेकिन फिर भी आज सबकी बातें सुनकर मुझसे रहा नहीं गया। और, फलस्वरूप मैं यह लिखने बैठ गया।
मेरी समझ में एक बात ये आती है कि आपको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए और लड़ाई में बने रहने के लिए, प्रतीकों की आवश्यकता पड़ती है। समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद, गांधीवाद, नारीवाद इत्यादि जितने भी वाद हैं, ये ऐसे ही प्रतिमान हैं जो समय समय पर गढ़े गये। किसी सामाजिक बदलाव के लिए, क्रांति के लिए नहीं ये सभी प्रतिमान गढ़े गये हैं स्वयं को स्थापित करने के लिए। व्यवस्था से असंतुष्ट, उससे रुष्ट कोई आक्रोशित व्यक्ति विद्रोह कर देता है, या कई बार वो सोचता है सिर्फ विचार करता है कि शायद ये होता तो अच्छा होता। ये समाज को साथ लाने के लिए, किसी स्थापित मूल्य की रक्षा के लिए भी हो सकता है और किसी स्थापित रूढी के खिलाफ भी। फिर...फिर वर्षों बाद, जब किसी को ये लगता है कि उसके पास न तो वैचारिक शक्ति है, न ही पर्याप्त साहस, लेकिन वो अपने आपको स्थापित करना चाहता है तो वह अपनी मौलिक विचारधारा नहीं रखता बल्कि पुरानी पड़ी किताबों में बंद कोई बढ़िया आइटम बाहर लाता है जो कि नया नहीं होता, मगर ठीक उसी तरह जैसे जीन्स और टी-शर्ट की पीढ़ी को एक बार कुर्ता कोई अति विशिष्ट और फैशनेबल परिधान लगने लगता है क्योंकि उसके साथ किसी नई कंपनी का ब्रांड होता है। उसी तरह ये पुरानी विचारधारा भी थोड़े से फैशन एलिमेंटस की वजह से मार्केटेबल बन जाती है और फिर गाँधी, आम्बेडकर, मार्क्स के साथ नाम जोड़कर मार्केटिंग का वो नुस्खा अपनाया जाता है जो मसलन दो सौ साल पुरानी चाय बेचने वाली दुकान इस्तेमाल करती है या फिर राजस्थान के शुद्ध वैष्णव ढाबे वाला। यानि कि विचारधारा को पुरानी बताने से वो प्रमाणिक लगने लगती है और उसके साथ नाम जोड़ने से आप किसी ख़ास समुदाय को टारगेट कर पाते हैं माने आपका कंज्यूमर सेगमेंट डिफाइन हो जाता है। फिर क्या है धडल्ले से बेच दीजिये माल। जबतक कोई नया आइटम नहीं आता है मार्किट में चाँदी है आपकी।
 
आज अम्बेदकर पर जिन 'मौलिक बुद्धिजीवियों' को सुना, उससे यहीं लगा कि मार्किट में नया माल ला रहे हैं, अम्बेडकरवाद ओपन मार्किट में लांच नहीं हुआ है मगर xiaomi की तरह सेल शुरू हो गयी है, मार्किट में आएगा कुछ दिनों में। संभव है कि अबतक आपके मन में मेरे प्रति तमाम विशेषणों का पूरा का पूरा एक कोष तैयार हो गया हो। अगर ऐसा है तो कोई नहीं उगल दीजिये। और आपमें से कुछ बुद्धिजीवी मुझ पर दयाभाव दिखाते हुए ये समझने का प्रयास करेंगे कि मैं इतना अधम कैसे हो सकता हूँ। उनके लिए भी है उपचार, तो बात दरअसल ये है की मैं हूँ "ब्राह्मण"। ओह्ह!!! अब तो मुद्दा ही साफ़ है आपको भी समस्या की जड़ नजर आ गयी होगी। सब इस ब्राह्मणत्व का दोष है लेकिन क्या करें प्रकृतिजनित है, हमारा कोई वश तो है नहीं मेरे ब्राह्मण होने पर। अब आप भी मुक्त हैं, मुक्तकंठ से मेरे सम्मान में चालीसा पढकर, मेरे कुल-वंश, और 5000 वर्षों की परम्परा वाला अध्याय पढ दीजिये।
 
आगे का उनके लिए है जो लोग अबतक मेरे सम्मान हेतु कमेंट्स टाइप करना न शुरू कर चुके हों। बात दरअसल ये है कि आज के एक वक्ता बात-बात पर "विरोधी ये कर रहे हैं, वो कर रहे हैं" किये जा रहे थे। "हमको साथ आना होगा" इत्यादि इत्यादि। "ऐसा हो जाये तो सब ठीक हो जायेगा" आदि आदि। बस ये विरोधी कौन है और 'ऐसा' कैसे हो इसपर किसी का कोई मत नहीं। किसी को इस बात से समस्या है कि चुनाव के दिन कोई राजनैतिक दल का प्रमुख यदि अपने घर हवन करा रहा है तो वह सेक्युलर नहीं है। कुमार विश्वास इसलिए घृणा का पात्र है क्योकि उसने मंच पर कविता के बीच ये कहा कि वो मास्टर का बेटा है और ब्राह्मण है। हें....
ब्राह्मण कहा स्वयं को... घोर पाप, घृणित है ये तो। मैं तो कहता हूँ कि डूब मरे कुमार विश्वास- ब्राह्मण पुत्र होने का पाप लेकर जीना कोई जीना है भला। जबतक आप "दलित" न हों आपको अपना वंश बताना कानूनन अपराध है और अगर आप दलित हों तो ये आपका मूल अधिकार है। मगर ये सब बातें धारा 0 के अंतर्गत आती हैं  और सारी की सारी किताबों में नहीं मिलेंगी। इसके अलावा कई उपबंध इस प्रकार हैं कि आप अपना पूरा परिचय देने में यदि 5 पंक्तियाँ बोलें तो कम से कम 3 बार यह बताएं कि आप दलित हैं और कोई भी दुसरा यदि आपको दलित वर्ग का कह दे तो इसे आप अपना अपमान समझें ।
ख़ैर!! आज तक जो कुछ थोडा बहुत मुझको मालूम था कि बाबा साहब बड़े कानूनविद थे, राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे इत्यादि इत्यादि। ये सारे भ्रम आज दूर हो गये और जब ज्ञान चक्षु खुले तो इतना बोध हो गया कि बाबा साहब महामानव थे जो ब्राह्मण शब्द से ही घृणा करते थे। दलित और सिर्फ दलित वर्ग के पुरोधा और नेता। बाबासाहब ने दलित उत्थान के अतिरिक्त अन्य कोई काम नहीं किया।
एक वक्ता ने तो अतिशय प्रभावित किया वो कहते हैं,  "दोस्तों हमें  संगठित होने के लिए पहले एक पैमाना बनाना पड़ेगा कि हमारे साथ आने वाले ये युवा किस मान्यता के हैं?ये उन्ही विचारों को मानते हों जिन्हें हम मानते हों, यद्यपि वाल्मीकि और रैदास को मानने वाले अलग हैं फिर भी वे दलित हैं वे साथ आ सकते हैं लेकिन कोई वेदाभ्यासी हो और गीता पढता हो, जनेउ धारण करता हो तो वो तो ब्राह्मणवादी और दलित विरोधी है।" बेहद सुन्दर, कितना सटीक पैमाना... अहा!!सारगर्भित। भई! बड़े सामाजिक परिवर्तन के लिए चयनित किये जाने वाले लोगों को कसने की कसौटी ऐसी तो होगी ही। हृदय प्रसन्न हो गया, महादेव की कसम। विष्णु ब्राह्मणवादी हो जाते, इसलिए नहीं किया उनका जिक्र।
अभिभूत, मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ताओं को 2 घंटे सुनकर हृदय की समस्त शंकाओं का निवारण हो गया। एक वक्ता ने आरक्षण के मुद्दे की भी बात उठाई। और बड़ी गंभीर शैली में कहा की "साथियों, आरक्षण का विरोध करने वाले नहीं जानते कि आरक्षण का उद्देश्य क्या है और इसका इतिहास क्या है?" मैं तनिक अतिरिक्त उत्सुकता के साथ सुनने को तत्पर हुआ किन्तु इतने गूढ़ विषय को शायद बता पाना असम्भव था याकि फिर जिस प्रकार अन्य बुद्धिजीवियों के सिर हिले उससे लगा की शायद पहले ही श्लोक में सब छिपा हुआ है और अर्थग्रहण के लिए उसी का अन्वय करना पड़ेगा। अब इतनी योग्यता थी नहीं तो हम उसे वही छोड़कर आगे सुनने लगे जैसे कॉपी में आधे तिहे पन्ने खाली छोड़कर स्कूल में आगे का टॉपिक नोट करने लग जाते थे।
 
बातें इतनी प्रभावोत्पादक थी कि बस जी में ठान लिया कि अब तो बस लड़ना ही है बदल देना है? क्या बदलना है ये सब तो वैसे भी जरुरी नहीं है, बात ये है कि बदलना चाहिए। क्यों बदलना चाहिए? क्योंकि ये जो है वो जो पहले था उसको बदल के आया है। और चूँकि हम ये मान रहे हैं क़ि जो है वो उससे बढिया है जो कि था तो सिद्ध हुआ कि बदलने से भला होगा। बात में दम है और हम सही काम में देरी करते नहीं, और वो भी जब क्रांति वगैरह टाइप के भाव दिल में हों, बिलकुल देर नहीं करते। क्योंकि बड़ा अस्थायी भाव है, न जाने कब ख़त्म हो जाये इसलिए क्रांति की भावना है बस लग लो तुरंत।
अब बदलने के लिए कुछ खास था नहीं, वक्ता लोगों ने चाय वगैरह लिया... बदलना जरुरी था तो डिस्कशन का इशू बदल दिए। बात करने के लिए घर परिवार और तमाम चीजें हैं, बाबा साहब की फिलॉसफी वाला चोंगा तो पार्टी वियर है घंटे दो घंटे से ज्यादा पहनोगे तो फट जायेगा। हमको बंद पंखे के नीचे बैठकर ज्ञान हो गया, बुद्ध बनकर बाहर आये, कदम कैंटीन की और चल पड़े, एक तो चाय पहले भी एक कप ले चुके थे ऊपर से बदलने के लिए ढृढ़प्रतिज्ञ, ब्लैक कॉफ़ी बना के पी लिए। बदलाव हो चुका था और परिवर्तन के भाव भी तिरोहित हो चले थे। परिनिर्वाण दिवस के लिया इतना तो काफ़ी था। शांत, निर्विकार मन लिए बुद्ध की भाँति धीरे धीरे हम कमरे में चले आये।
बाबा साहब अमर रहें।

अगले महापरिनिर्वाण दिवस तक के लिए विदा।

राघवेन्द्र त्रिपाठी 'राघव'  
(लेखक जीवन मैग के संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.टेक/ बी.एस इन इनोवेशन विद मैथ्स एन्ड आइटी के छात्र हैं तथा ग़ज़ल में गहरी रूचि रखते हैं.)


****लेख के विषय-वस्तु से संपादन मंडली का राज़ी होना ज़रूरी नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जीवन मग परिवार सम्मान करता है। ***

Monday, 8 December 2014

शॉर्ट टर्म सीएम के लॉन्ग टर्म बोल! (व्यंग्य)


आजकल बिहार के मुख्यमंत्री को अपने काम से ज़्यादा बयान पर ध्यान देना होता है,काम पर क्यों ध्यान दे ये तो चलता रहेगा पर उनकी गाड़ी का क्या अब खिसकने में कुछ ही दिन जो रह गये हैं। वैसे भी सुशासन बाबु जो काम पर ध्यान लगाए हुए हैं ही,लालू जी भी तो उनका सहयोग दे ही रहे हैं। सीएम जीतन जी के घर में आपको राम जी के जगह नीतीश जी की फोटो मिलेगी क्योंकि जीतन जी के लिए ये पुरुष ही नही महापुरूष हैं! भला,इस घोर कलयुग में जहां अपने बस की कुर्सी नही छोड़ते, इन्होने सीएम की कुर्सी छोड़ दी ! (बात को दबा के रखिये; नमोफोबिया वाले हैं हमसब )
बेचारे नीतीश जी के दाव उल्टे पड़ गये रिमोट कंट्रोल वाली सरकार बनाने चले थे,पर ये तो "आउट ऑफ़ कवरेज एरिया" हो गया! राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में विकास कार्य पिछले 2 साल से ठप पड़े हैं। इन सबके ज़िम्मेदार नीतीश कुमार हैं।
लोकसभा में मजदूरी मांग रहे थे जो खुद दुसरे (राज्य कर्मचारी) को देने से इतराते रहे, सड़क पर लठवाते रहे....जनता सब याद रखती है।
*मिला ना बाबा जी का ठुल्लू*
मिला तो गिरिराज को जो चुनाव में गधे की तरह रेंकते रहे,अब सुस्ताने के लिए डेल्ही में हैं।
** मांझी के तराने....
जीतन ने मंदिर से पकड़े चूहे को नीतीश का विदेशी भक्त बताते हुए अपने प्रधानमंत्री बनने से पहले 5000रु देकर बीजेपी के साथ इसकी अस्थि गंगा में बहाने का सपना देख रहे है।


"कड़वा" भी इसलिऐ लगता हूँ लोगों को!
क्योंकि सच बोलता हूँ!
आप कहो तो "मीठा" हो जाऊँ.
फिर ये न कहना...
"बहुत झूठ बोलते हो यार.."

आलोक कुमार वर्मा
कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज
दिल्ली विश्वविद्यालय


****लेख के विषय-वस्तु से संपादन मंडली का राज़ी होना ज़रूरी नहीं है.***

Thursday, 27 November 2014

देवताओं के एजेंडे (व्यंग्य)- संतोष



इवनिंग वाकिंग का भी अपना ही मज़ा है| साथ में अगर गप्पें मारने वाले मित्रगण हों तो समय से पहले ही चारों चाँद निकल आते हैं| होस्टल से कुछ ही आगे निकला की मेट्रो स्टेशन के पीछे “कृष्णभक्तों” की टोली दिखाई पड़ी| भक्तों की श्रध्दा देखिये आस-पास मुरली मनोहर की कोई प्रतिमा भी नहीं है ,पर हर किसी ने दिल में ही प्रभु को बसा लिया लगता है| ऐसा प्रतीत हो रहा था की वृन्दावन ही पहुँच गया हूँ| हर कोना कृष्णमय हो गया था| कृष्ण पेड़ की डाल पर बैठा करते थे ,पर कांटेदार पेड़ होने के कारण चबूतरों व सीढियों को ही यह सौभाग्य प्राप्त हो रहा था| दूसरों की ख़ुशी से इंसान खुश होता है और दूसरों के दुःख से दुखी पर आज, अभी तक भगवन की भक्ति न मिलने के कारण दूसरे भक्तों से ईर्ष्या हो रही थी| आगे बढ़ते ही कक्कड़ की दुकान पर शिवभक्तों की मंडली नजर आई | डमरू और त्रिशूल के अलावे सब कुछ था भक्तों के पास| भक्तों की भीड़ व भक्ति इतनी की सब एक साथ अगर कैलाश पर्वत पहुँच जाय तो कैलाश का बर्फ भी पिघल जाय| मन ही मन सोचा की कैसे लोग अपने इष्टदेव का चयन करते होंगे? स्वत: ही संभावित उत्तर सूझा , शायद नेताओं की तरह भगवानों के भी अपने –अपने एजेंडे होते होंगे| जिसे जिनका एजेंडा पसंद आए उन्हें अपना लो| अगर ऐसा ही हो तो किनका एजेंडा सर्वाधिक लोकप्रिय होगा? जब वहां से आगे निकला तो दृश्य देख कर दंग रह गया| दिल्ली की इस कड़कड़ाती सर्दी में सड़क के किनारे कोई कपड़ों का एक चादर ओढ़े तो कोई अपनी खाल की चादर ओढ़े सोये थे| शायद इंद्रदेव अपना एजेंडा तय नहीं कर पाए थे| एक भी भक्त अपने पक्ष में न आते देख क्रोधवश हारे हुए नेता की तरह रात को वर्षा करा दी| तनिक भी न सोचा की ये बेचारे कहाँ जायेंगे| छप्पन करोड़ देवी-देवताओं में से किसी का भी एजेंडा अगर इन सड़क पर रात गुजारने के लिए नहीं है तो इन नेताओं से भला क्या आशा की जाये|
संतोष कुमार जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं। आप दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए स्नातक (मानविकी और समाजशास्त्र) के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के सामुदायिक रेडियो में ओबी प्रभारी हैं.

Monday, 25 August 2014

बतकही

बातों ही बातों में जो बात, बात बनते बनते बात बनकर बात बन जाती है उस बात के पीछे भी कोई बात हो अथवा ना हो किंतु परन्तु  के  संदर्भ में उस बात को बात बनाकर बातों ही बातों में उड़ा देना भी एक बात है. इसका मतलब ये हुआ कि हरेक बात बात बनें या ना बनें लेकिन बातों ही बातों में बात बनकर उड़ जाने के तत्पश्चात उस बात का निरूपण इस बात के साथ किया जाना चाहिए कि बात फिर से किसी बात को लेकर बातों ही बातों में बात ना बन जाए. इक बात मैं भी आपको बता दूँ कि जो बात मैं बाताऊँगा उस बात का सम्बन्ध भी किसी बात से होना उतना ही लाजमी है जितना कि इस बात का सम्बन्ध उस बात से. अब ये भी सत्य है कि जब वो बात भी किसी ना किसी बात से ही उभरी हुई है तो क्यूँ ना उस बात को भी इस बात के साथ बातों ही बातों में बात बनाकर उड़ा दिया जाए. खैर . . . मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है . . . और दूसरे लफ़्जो में ये भी इक बात ही है.  


 कुमार शिवम् मिश्रा जीवन मैग की संपादन समिति के सदस्य हैं. आप कॉमर्स कॉलेज, पटना में अंग्रेजी स्नातक (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं.

Thursday, 12 June 2014

ऑक्सफ़ोर्ड- विख्यात

बेटा- बाबू जी, अब हमनी के त ग्रेजुएशन हो गईल... 
सोचत बा मास्टर्स फोरेन युनिवेर्सिटी से कर लें.... 

लालू- ई त बड निक आईडिया बा हो.....
चल तोहार एड्मिसन ऑक्सफ़ोर्ड में करवा दूँ .... 
 बेटा- ना बाबू , वहां ते डिक्सनरी पढैत पढैत क त हमर जान निकल जेतय ....

विख्यात बड़बड़िया


(लेखक सनबीम स्कूल, वरुणा, बनारस

 में 11वीं कक्षा के छात्र हैं.)

(ये लेखक के अपने विचार/व्यंग्य हैं)


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Monday, 9 June 2014

ट्रेन के सफ़र में- विख्यात




आज अपने एक महत्वपूर्ण सफ़र (बताना ज़रूरी नहीं है) के सिलसिले में ट्रेन की यात्रा का आनंद उठाता जा रहा हूँ..... यात्रा के दौरान एक से एक रोचक कारनामों के दीदार हो रहे हैं..... (हंसते हँसते पेट ढीला हो गया है)

देखिए ना अभी अभी एक ठंडा (नाम का ठंडा) बेचने वाला 'कोका-कोला' को 'कंपा-कोला' कहते हुए गुज़रा तो पीछे से 'मूँगफली' को 'मोमफ़ली' कहता हुआ दूसरा आ धमका...नारियल और रामदाना वालों की तो पूछो ही मत... (उनकी महिमा राम ही जाने)..... अपनी अज़ीबो ग़रीब आवाज़ में एक से एक चीज़ें बेचते हुए मेरे बर्थ के सामने से गुज़र रहे हैं....
इसी दरम्यान एक बादाम वाला राग भैरवी में 'बादाम बोलो... बादाम बोलो...' अनवरत चिल्लाए जा रहा था... मैं गुस्से में 'बादाम...बादाम...' बोलने लगा.... मगर वो अपनी ही धुन में गुनगुनाता अगले डिब्बे की ओर बढ़ गया.... (वैसे भी बादाम का दाम केजरीवाल की टोपी की कीमत से कम नहीं था...)....!





विख्यात बड़बड़िया 


(लेखक सनबीम स्कूल, वरुणा, बनारस

 में 11वीं कक्षा के छात्र हैं.)

(ये लेखक के अपने विचार/व्यंग्य हैं)

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Saturday, 7 June 2014

आप देश के किस हिस्से में हैं?- आलोक कुमार वर्मा

आप कैसे पहचानेंगे कि आप देश के किस हिस्से में हैं .....?
1) दो आदमी लड़ रहे हैं, एक आदमी आता है,उन्हे देखता है और चला जाताहै... ये 'MUMBAI' है.
2) दो आदमी लड़ रहे हैं, एक आदमी आता है, उन्हें समझाने की कोशिश करता है, फलस्वरुप दोनो लड़ना छोड़ कर समझाने वाले को मारने लग जाते हैं... ये 'DELHI' है.
3) दो आदमी लड़ रहे हैं, एक आदमी अपने घर से आवाज़ देता है, "मेरे घर के आगे मत लड़ो, कहीं और जाओ".... ये 'BANGALORE' है.
4) दो आदमी लड़ रहे हैं, पूरी भीड़ देखने के लिये इकट्ठी हो जाये, और एक आदमी चाय की दुकान लगा दे.... तो ये 'GUJARAT' है.
5) दो आदमी लड़ रहे हैं, दोनो मोबाईल से कॉल कर दोस्तो को बुलाते हैं, थोड़ी देर में 50 आदमी लड़ रहे हैं. ..ये 'HARYANA ' है.
6) दो आदमी लड़ रहे हैं, एक आदमी ढेर सारी बीयर ले आता है, तीनो एक साथ बीयर पीते हुए एक-दूसरे को गाली देते हैं.. ये ज़रूर 'GOA' है.
7) दो आदमी लड़ रहे हैं, दो आदमी और आते हैं, वो आपस में बहस करने लगते हैं कि कौन सही है कौन गलत, देखते देखते भीड़ जमा हो जाती है, पूरी भीड़ बहस करती है, लड़ने वाले दोनो खिसक लेते हैं. ये 'KOLKATA' है.
8) दो आदमी लड़ रहे है, एक आदमी आता है, गन निकालता है और ढिचकांव. और सब शांत हो जाता है. यानि कि आप UP पहुँच गए.
9) अगला नंबर है BIHAR , बिहार में पहले बात फिर ना माने तो दोनों को लात!!!

संकलन- आलोक कुमार वर्मा

Tuesday, 1 April 2014

घटकैती (व्यंग्य)- संतोष


 
बेटी की शादी के बाद चाचा जी को पता चल गया था की बेटी के पिता को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं| उन्होंने तय किया की अपने बेटे की शादी में बेटी वाले पक्ष को तनिक भी परेशानी महसूस नहीं होने देंगे| वह शुभ घड़ी भी आ ही गई| लड़का ऊँचे खानदान का था और उसमे भी बैंक की सरकारी नौकरी इसलिए आगंतुकों की लाइन लगी रहती थी| आख़िरकार एक लड़की की तस्वीर पसंद की गई| मेरा बैठक तो माने दूसरों के विवाह तय करने के लिए ही बना था| वहीं एक बार फिर कुर्सियां मंगवाई गई, नया बेडसीट बिछाया गया, शर्बत फिर चाय और बिस्कुट आने के साथ ही माहौल गंभीर हो गया| तपाक से लड़की के पिता के बगल में बैठे दिन में सज्जन दिखने वाले पुरुष ने बिस्कुट खाते हुए कहा “समधी जी तो अब मुद्रा की बात हो जाय’’| चाचा जी ने कहा की मुझे एक रूपया भी दहेज़ नहीं चहिये| अगर आपको फिर भी देना ही है तो, 11 रूपया, एक जनऊ, और एक टुक सुपारी दे दीजिये मै प्रेम से रख लूँगा| सभी लोग अवाक् हो कर चाचा को देखते ही रह गए| पड़ोस के लोगों को डर लग रहा था कि बाराती के लिए भी न कहीं मना कर दे, कितने दिनों से अरमान लगा रखा है| बेटी वालों को लग रहा था कि किसी ने उन्हें क्लोरोमिंट कैंडी खिला दी है| उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था| लगभग दस मिनट तक सब खामोश बने रहे| एक लड़का आया और खाली गिलास और प्लेट लेकर चला गया| थोड़ा आगे जाते ही उसने प्लेट में बचे सारे बिस्कुट पॉकेट में डाल लिए| अचानक लड़की के पिता ने कहा “समधी जी घर पे गोरु को बछड़ा हुआ है, जल्दी जाना पड़ेगा सो अब आज्ञा दीजिये’’ मै फिर एक दो दिन में आकर आगे की बात फाइनल कर लूँगा| चाचा जी ने ख़ुशी–ख़ुशी सबको विदा किया|
दो महीने बाद एक फ़ोन कर चाचा ने देरी का कारण जनना चाहा| लड़की के पिता ने कहा जरुर आपके लड़के में कोई खराबी होगी, नहीं तो कौन आजकल 11रूपया और जनऊ, सुपारी में शादी करता है| मैंने अपनी बेटी की शादी कर दी चार लाख रुपये और एक मोटर साईकल दिया है अपने दामाद को| चाचा तो अब बन गए चौधरी| कुछ दिन बाद नए लोग आये  तो चाचा ने कहा 6 लाख रूपया और और एक अपाची लूँगा |अबकी बार ख़ुशी–ख़ुशी भैया की शादी हो गई|
अचानक मुझे ख्याल आया की इनोवेशन के लिए अभी हमारा समाज तैयार नहीं हुआ है| ये केवल CLUSTER INNOVATION CENTRE में ही संभव है||         

 
- संतोष
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र एवं चर्चित व्यंग्यकार हैं |)





साभार‍- जीवन मैग फ़रवरी मार्च २०१४ अंक
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