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Monday, 6 March 2017

अमेरिका में नस्लीय हिंसा सुनियोजित तो नहीं? -अबुज़ैद अंसारी

हाल ही में नस्लीय भेदभाव के कारण अमेरिका में भारतीयों पर हुए हमले में श्रीनिवासन नामक भारतीय ने अपनी जान गवां दी थी। इस घटना के बाद से वहां रह रहे भारतीयों में भय और तनाव का माहौल बना हुआ है। इस घटना के कुछ ही समय बाद न्यूयॉर्क की एक ट्रेन में एकता देसाई नामक भारतीय लड़की से बदसुलूकी का मामला सामने आया।  वहां रह रहे भारतीय समुदाय के लोग अभी श्रीनिवासन की हत्या के दर्द से बाहर भी नहीं आ पाए थे कि अमेरिका में कई दशकों से रह रहे हर्निश पटेल नामक व्यापारी की उसके घर में ही हत्या कर दी गई, और इस घटना के बाद एक सिख व्यक्ति को गोली मारी गई जिसमे हमलावर ने घटना को अंजाम देते हुए कहा कि "मेरे देश से निकल जाओ" हर्निश पटेल की हत्या के पीछे क्या कारण हो सकते हैं यह स्पष्ट नहीं है मगर इसमें नस्लीय हिंसा का अंदेशा हो सकता है। अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र में होने वाली ऐसी घटनाएं अमेरिका और भारत दोनों के मध्य कुछ बड़े सवालों को जन्म देती हैं। जिनका संतुष्टिपूर्ण उत्तर मिल पाना लगभग मुश्किल है। उदाहरण के लिए बहुत लंबे समय से अमेरिका में रह रहे इन सीधे साधे भारतीयों पर जिनसे किसी अमेरिकी को किसी प्रकार का खतरा नहीं हो सकता। उन पर अचानक से इस प्रकार जानलेवा हमले कैसे होने लगे? यह सीधे साधे भारतीय लोग संघर्ष कर के भारत से अमेरिका जाते हैं और वहाँ मेहनत से काम करते हैं और अमेरिका की तरक्की में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस बात का अंदाज़ा इससे ही लगाया जा सकता है कि वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को अमेरिका भेजने वाले एशियाई देशों में भारत शीर्ष पर है। 2003 से 2013 तक इस संख्या में 85 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के लिए अमेरिका जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में 24.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दुनियाभर में 80 प्रतिशत से अधिक प्रवासी दस देशों में हैं जिनमे से 20 प्रतिशत सिर्फ़ अमेरिका में हैं। इनमे भारतीय प्रवासियों की संख्या अधिक है जैसा कि आंकड़ो से स्पष्ट है।

Photo credit: Andhrawishesh.com

हाल ही में अप्रवासी भारतीयों पर होने वाले हमलों को ट्रम्प की कट्टर नीतियों के प्रभाव के रूप में भी देखा जा सकता है। राष्ट्रपति  बनने से पहले चुनाव अभियान में ट्रम्प ने ऐसे कुछ विवादित बयान दिए थे जिसका प्रभाव अब वहाँ रह रहे आप्रवासियों पर साफ़ देखने को मिल रहा है। मगर आश्चर्य होने के साथ साथ यह बड़ा अजीब लगता है जब कुछ लोग इस इस नस्लीय हिंसा के पीछे पूर्ण रूप से ट्रम्प की कट्टर नीतियों को ज़िम्मेदार मानते हैं और फिर ट्रम्प ही इसकी निंदा करते हैं।  एक आशंका यह भी है कि अमेरिका में बसे भारतीयों को निशाना बनाने के लिए उन पर लगातार हो रहे इस प्रकार के हिंसक हमले पूर्णरूप से सुनियोजित हो जिस पर नस्लीय हिंसा का मुखौटा लगाया जा रहा हो। अगर ऐसा है तो समझ लेना चाहिए कि भारत और भारतीयों से नफ़रत करने वाले लोग अमेरिका में भारतीयों को पनपता हुआ नहीं देखना चाहते हैं। मगर एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर ऐसा है तो फिर यह हमले हाल-फिलहाल में क्यों तेज़ हुए, पहले क्यों नहीं? तो इसका सामान्य सा जवाब लोग यही देते हैं कि यह सब ट्रम्प के आने से हो रहा है। हम इन नस्लीय हिंसक हमलों के पीछे ट्रम्प को या उनकी नीतियों को पूर्णरूप से ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते, कभी कभी नफ़रत फैलाने वाले लोग दूसरों की नीतियों की आँड़ में छिपकर उसका दुरुपयोग करते हैं।  आप्रवासियों पर हुए हमलों से सम्बंधित एफबीआई के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पिछले पांच साल में आप्रवासियों पर सबसे अधिक हमले वाशिंगटन डीसी में हुए हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि यहाँ रहने वाले कुल आप्रवासियों में भारतीयों का प्रतिशत बहुत कम है। एफबीआई के आंकड़ों के अलावा अगर यूएस सेन्सस ब्यूरो स्टेटिक्स के 2003 से 2013 के आंकड़ों पर दृष्टि डाले तो कैलिफोर्निया में 19 प्रतिशत, न्यूजेर्सी में 11 प्रतिशत, टेक्सास में नौ प्रतिशत के हिसाब से आप्रवासी भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है। अमेरिका के अन्य राज्यों की तुलना में वाशिंगटन, न्यूजेर्सी, कैलिफोर्निया में भारतीयों के ख़िलाफ़ नस्लीय हिंसा की घटनाएं अधिक होती हैं।

मूल अमेरिकी जनसँख्या का एक बहुत बड़ा वर्ग है जो इस प्रकार की हिंसा का विरोध करता है। ऐसे लोग अमेरिका में बसे आप्रवासियों के लिए उदारवादी दृष्टिकोण तो रखते ही हैं साथ ही प्रतिकूल परिस्थितियों में उनके लिए आवाज़ उठाने से भी पीछे नहीं हटते। वहाँ रह रहे भारतीय समुदाय के लोग इतने सशक्त हैं जो अपने लिए आवाज़ उठाने में सक्षम हैं। नस्लीय हिंसा जैसी संवेदनशील परिस्थितियों में आप्रवासी भारतीयों के लिए इन उदारवादी अमेरिकी नागरिकों का साथ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस सन्दर्भ में इयान ग्रिलोट सबसे अच्छा उदाहरण हैं जो श्रीनिवासन की जान बचाते समय घायल हो गए थे। मगर अफ़सोस तब होता है जब अमेरिका में कुछ संस्थाएं आप्रवासियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाती हैं और उनका एकमात्र उद्देश्य नफरत और हिंसा फैलाना है। फेडरेशन फॉर अमेरिकन इमिग्रेंट्स रिफार्म (फेयर) एक ऐसी ही संस्था है। अमेरिकी सरकार को ऐसी संस्थाओं पर तत्काल रोक लगाने की ज़रुरत है क्योंकि इस प्रकार की संस्थाए अमेरिका को अंदर से खोखला करने के सिवा कुछ नहीं करती। नस्लीय हिंसा पर राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा की गई निंदा को गंभीर रूप से एक चेतावनी के रूप में देखने की ज़रुरत है। अब देखना यह है कि राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा की गई निंदा के बाद भी नस्लीय हिंसा की वारदातों में कुछ कमी आएगी या नहीं, अगर इन वारदातों में कमी नहीं आती है तो "अमेरिका फर्स्ट" की बात करने वाले ट्रम्प के लिए नस्लीय हिंसा के खिलाफ जाकर आप्रवासियों के पक्ष में कड़े फैसले लेना परीक्षा की घड़ी होगी।  

Abuzaid Ansari
अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक होने के साथ-साथ भारतीय विज्ञान कांग्रेस (कोलकाता), और  नेशनल एसोसिएशन फॉर मीडिया लिटरेसी एजुकेशन (न्यूयॉर्क) के सदस्य हैं। और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं।





Tuesday, 8 November 2016

नोट में बदलाव क्यों? -अबुज़ैद अंसारी


देश में एक हज़ार और पांच सौ के नोट में बड़ा बदलाव करके भारत सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने के लिए महत्वपूर्ण क़दम उठाया है। हर देश की सरकार यही चाहती है कि उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में गिनी जाये इसलिए सरकार का यह निर्णय इस दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। मगर भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले छठे दशक में मोरारजी देसाई जब वित्तमंत्री थे तब भी तत्काल सरकार ने कुछ इसी प्रकार के निर्णय लिए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने इस निर्णय के सकारात्मक पहलुओं को गिनाते हुए देश भर में इसे लागू कर दिया मगर यह फैसला जिस अंदाज में लिया गया उसने देश की जनता के समक्ष बहुत सारे प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इस देश का हर नागरिक यहाँ की अर्थव्यवस्था से प्रभावित होता है। और यहाँ की अर्थव्यवस्था देश के हर नागरिक से प्रभावित होती है। इसी कारण यह अपने आप में बहुत अजीब बात है कि ऐसा महत्वपूर्ण निर्णय जो अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ हो और जिसका प्रभाव व्यापक रूप से लोगों पर पड़ने वाला हो, अचानक और इतनी जल्दबाज़ी में कैसे लिया जा सकता है? यह तो बहुत जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय प्रतीत होता है। जिसकी कोई तैयारी नज़र नहीं आती, अगर सरकार इसके लिए तैयार भी है तो देश की जनता बिल्कुल भी तैयार नहीं है। अगर यह निर्णय गोपनीय था इसलिए कि भ्रष्टाचारी और काला धन जमा करने वाले लोग सचेत न हो जाएं तो ऐसे में सरकार का इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले गरीबों, मज़दूरों, किसानों और प्रतिदिन कमाकर खाने वालों का एक बार भी ख्याल क्यों नहीं आया? 



प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि "यह सरकार गरीबों के प्रति समर्पित है।" अगर सच में यह सरकार गरीबों के प्रति समर्पण की भावना रखती है तो दूसरे विकल्पों के माध्यम से कुछ ऐसे नियम बनाए जा सकते थे जिनसे इस फैसले को लागू करने से पहले गरीब, मज़दूर, किसान जैसे वर्ग आदि को सुविधाएं हो सकती थी। उनका कहना तो ये भी था कि देश का ईमानदार जागरूक नागरिक असुविधा को चुन सकता है। मगर भ्रष्टाचार को नहीं चुनेगा, ऐसी परिस्थितियों में यह ईमानदार जागरूक उस घुन के सामान प्रतीत होता है जिसे ज़बरदस्ती गेहूं के साथ पिसना पड़ रहा है। इस निर्णय को लागू करने के पीछे सरकार का सबसे बड़ा तर्क यह है कि भ्रष्टाचार कम होगा और कालेधन पर शिकंजा कसा जाएगा क्योंकि भ्रष्टाचार और कालेधन में अधिकतर बड़े नोटों का प्रयोग किया जाता है। अगर ऐसा है तो फिर सरकार एक हज़ार की जगह दो हज़ार का नोट क्यों जारी कर रही है? अधिकतर सन्दर्भ से भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में भारत के लिए ये कोई नई बात नहीं है।   असंगठित अर्थव्यवस्था के कारण अभी देश को इस निर्णय पर पूरी तरह से अमल करने में समय लग सकता है। सरकार के इस फैसले से जाली नोट पर रोकथाम लगाई जा सकेगी। जाली नोट की समस्या से हमारा देश शुरू से ही परेशान रहा है। देश के बाहर से तस्करी कर के लाये जाने वाले जाली नोट जब तब बाजार में पकड़े जाते हैं। और इन पर पूर्णरूप से अंकुश लगाना मुश्किल था। मगर सरकार के इस फैसले से जाली नोट की समस्या का जड़ से सफाया होने की सम्भावना है। फिर भी एक समस्या यह खड़ी हो सकती है कि अगर पड़ोसी देश से नए नोट के जारी होने के बाद उसके जाली नोट बाज़ार में आ गए तब मुश्किलें पहले से और अधिक बढ़ सकती हैं क्योंकि हम पुराने नोट से जितनी भलीभांति परिचित है, उतना नए नोट से नहीं होंगे इसलिए नए नोट लागू करने के साथ सरकार को अब नोट की तस्करी के प्रति पहले से अधिक गम्भीर रहना पड़ेगा।

Abuzaid Ansari

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक होने के साथ-साथ भारतीय विज्ञान कांग्रेस (कोलकाता), और  नेशनल एसोसिएशन फॉर मीडिया लिटरेसी एजुकेशन (न्यूयॉर्क) के सदस्य हैं। और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं।




Saturday, 5 November 2016

मीडिया पर प्रतिबंध: कितना सही, कितना ग़लत -अबुज़ैद अंसारी

खींचो न कमानों को,  न तलवार निकालो

जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो


अकबर इलाहाबादी द्वारा लिखी गई यह पंक्तियाँ अपने आप में क़लम की ताकत को स्पष्ट करती हैं। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सन्दर्भ से भी देखा जा सकता है। मगर वर्तमान समय में ऐसी परिस्थितियां बन चुकी हैं कि उसको ध्यान में रखते हुए तो यही लगता है कि अब लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है। हाल ही में सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा एनडीटीवी  पर एक दिन के लिए लगाया गया प्रतिबंध इस बात को स्पष्ट करता है। एनडीटीवी पर आरोप है कि उसने पठानकोट हमले की रिपोर्टिंग में कुछ ऐसी गलतियां की जिसके कारण देश की सामरिक सूचना चैनल के माध्यम से लीक हो गई। मगर प्रश्न यह है कि एनडीटीवी के अलावा और भी टीवी चैनल ने पठानकोट में आतंकी हमले की रिपोर्टिंग की थी फिर सरकार ने उनके ख़िलाफ़ ऐसा कोई क़दम क्यों नहीं उठाया? एनडीटीवी ने स्पष्ट किया कि उसकी रिपोर्टिंग सामान्य और संतुलित थी। अगर ऐसा है तो फिर एनडीटीवी और दूसरे चैनल के मध्य रिपोर्टिंग में वो कौन से अंतर हैं जिसके आधार पर यह प्रतिबंध सिर्फ एनडीटीवी पर ही लगाया गया। अगर एनडीटीवी की दलील गलत है और सरकार का प्रतिबंध सही है तो सरकार को चाहिए कि वो अपना तर्क स्पष्ट करे ताकि इस प्रतिबंध पर उन लोगों को संतुष्टि हो सके जिन्हें इस पर आपत्ति है। अगर रक्षा संबंधी सूचना के लीक होने का मामला सही है तो सरकार का चैनल पर प्रतिबंध लगाना भी शत प्रतिशत सही है।



एक  बड़ा प्रश्न यह भी है कि एनडीटीवी ने ऐसी गलती की है तो सरकार को निर्णय लेने में इतनी देर क्यों लग गई? यह प्रतिबंध तो बहुत पहले ही लग जाना चाहिए था क्योंकि पठानकोट घटना तो जनवरी में हुई थी और उसे बीते हुए लगभग दस माह गुज़र चुके हैं।यहाँ बात सिर्फ एक टीवी चैनल का पक्ष लेने या उसके प्रति हमदर्दी और दूसरे चैनल के प्रति घृणा करने की भी नहीं है। बात संपूर्ण मीडिया जगत के लिए है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। अगर पत्रकारिता के प्रति देश की सरकार का ऐसा रवैय्या रहा तो वैश्विक स्तर पर भारत की छवि एक धुंधले लोकतांत्रिक देश जैसे हो जाएगी, या फिर कहीं ऐसा न हो कि भारतीय मीडिया को लोग उत्तर कोरिया, बर्मा, सीरिया और सऊदी अरब जैसे देशों की मीडिया में शुमार करने लगें, जहाँ मीडिया एक ज़िंदा लाश है। 

मीडिया का कर्त्तव्य लोगों तक सूचना, शिक्षा, मनोरंजन पहुँचाने के साथ-साथ समाज की समस्याओं को उजागर करना और लोगों को उनके प्रति जागरूक करना है। मगर परिस्थितियों को देख कर ऐसा लगता है जैसे मीडिया अपने इस कर्त्तव्य को भूल चुका है। वर्तमान समय में भारतीय मीडिया दो पक्षों में विभाजित होता प्रतीत होता है। किसी बात पर एक पक्ष अगर हाँ कहता है तो दूसरा बदले में उस पर नहीं के संकेत देता है। एक चैनल अगर सरकार की किसी विशेष उपलब्धि को लेकर उसका गुणगान करता है तो दूसरा उसी विशेष बात को मुद्दा बना कर उसकी निंदा करे बिना नहीं रह सकता। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में पड़ी ये दरार उसे कमज़ोर बनाती है। अगर ऐसे ही ये दरार गहराती रही तो किसी दिन यह स्तंभ इसी दरार के कारण टूट कर बिखर जाएगा।

Abuzaid Ansari

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक होने के साथ-साथ भारतीय विज्ञान कांग्रेस (कोलकाता), और  नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ मीडिया लिटरेसी एंड एजुकेशन (न्यूयॉर्क) के सदस्य हैं। और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं।




Thursday, 3 November 2016

जामिया का सतरंगी स्थापना दिवस -अबुज़ैद अंसारी

हक़ीकत सुर्ख मछली जानती है
समुन्दर कितना बूढ़ा देवता है

जामिया के 96वें स्थापना दिवस के इस ऐतिहासिक अवसर पर बशीर बद्र की लिखी ये पंक्तियां साकार होती नज़र आती हैं। अगर समुन्दर की तुलना जामिया से की जाये तो स्वाभाविक है कि सुर्ख मछलियां यहाँ के विद्यार्थी ही होंगे। विद्यार्थियों से बेहतर इसकी हक़ीकत और कौन समझ सकता है? इस विश्वविद्यालय का लालन-पालन देश के महान नेताओं, विचारकों, समाज सुधारकों और साहित्यकारों द्वारा हुआ है। यह ज्ञान का वो सागर है जिसमे जो जितनी गहरी डुबकी लगाना चाहे लगा सकता है। इसकी गहराई अनंत है। इस अनंत गहरे सागर से समय-समय पर बहुमूल्य मणियाँ निकलती रही हैं।

जामिया का स्थापना दिवस महज़ औपचारिक कार्यक्रम नहीं है। यह वह समय है जब यहाँ के विद्यार्थी बेफ़िक्री से मौज-मस्ती करने के लिए आज़ाद होते हैं। यूँ तो वे हर दिन आज़ाद होते हैं और हर दिन क़ैद भी, मगर इस आज़ादी की भावना स्थापना दिवस के उत्सव रंग से रंगी हुई होती है। स्थापना दिवस पर तालीमी मेले में क़दम रखते ही ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरा जामिया सिमट कर एक मैदान में समा गया हो। एक तरफ से चलना शुरू करें तो दो-तीन क़दम चलते ही नए विभाग का स्टाल नज़र आता है। कहने और दिखने में मात्र स्टाल ही हैं। मगर आपके पास हट कर देखने का दृष्टिकोण है तो इन स्टालों पर सम्बंधित विभागों की मुख्य विशेषताओं की झलक दिखाई देने लगती है। तालीमी मेले का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि यहाँ आने वाले दर्शक सभी विभागों की मुख्य-मुख्य विशेषताओं से परिचित होते हैं। मज़े की बात यह है कि हर साल तालीमी मेले में हर विभाग के पास कुछ ना कुछ अलग और नया देखने को मिलता है। जैसे-जैसे दिन ढलता जाता है और शाम क़रीब आती है तो लोगों की चहल-पहल और बढ़ जाती है।
AJKMCRC GATE

अक्टूबर के अंत की इन तीन ठंडी शामों में जामिया बड़ी गर्मजोशी से कार्यक्रमों में आने वाले अथितियों का स्वागत करता है। स्थापना दिवस की शाम अनेक रंगों से रंगी होती है। या यूँ कहेँ कि सतरंगी होती है। यह रंग आम दिनों में देखने को नहीं मिलती, दोपहर संगीत और क़व्वाली के रंग में डूबी हुई तो अगले पहर यह नृत्य के रंग में रंगी हुई। शाम ढलते-ढलते इस पर ग़ज़ल का रंग चढ़ जाता है। और जब ग़ज़ल का रंग जामिया के वातावरण में मिल जाये तो शायराना ख़ुश्बू की महक तो आनी लाज़मी ही है।

यह सत्य है कि ज्ञान को जितना बांटों उतना बढ़ता जाता है और धन बांटने से घट जाता है। इसे हम ज्ञान का मंदिर कहें या ज्ञान का सागर मगर एक बात ज्ञान बांटने के सन्दर्भ में समझ आती है कि कहने को तो यह 96वें वर्ष का प्रौढ़ जामिया है। मगर यह प्रौढ़ नाममात्र कहने को है। छात्रों की गतिविधियों को देखते हुए और आधुनिकता से सामंजस्य बिठाते हुए जामिया हरदम युवा लगता है। यह हर वर्ष अपने स्थापना दिवस पर नया हो जाता है। नई आशाएं, नए विचार, और नई ऊर्जा के साथ भर उठते हैं।

नोट:- (मूल रूप से जामिया समाचार पत्र में प्रकाशित अबुज़ैद अंसारी द्वारा लिखित यह लेख दिनांक 29 अक्टूबर 2016 के संपादकीय पृष्ठ से लिया गया है।)


Abuzaid Ansari

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) में जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक हैं, और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं। 

Sunday, 14 August 2016

Independence Day: A time to celebrate and reflect upon- Akash Kumar

It's not just an occasion to celebrate but also to reflect upon where we are headed as a country. As much as it is the moment to take pride in the fact that we have proved Churchill wrong and one of the greatest experiments in the history of democracy has endured, it's also the time to further strengthen the democratic and secular values of our beloved motherland.



In the land of Buddha, a deficit of centrist middle ground is quite evident in politics. Either you are "right" or "left", "with us" or "against us". There is no other way. While the left's lament regarding the freedom of speech and intolerance are heavily exaggerated, the space for dissent in public sphere has shrunk. It's not just the government and the bigoted right wing internet army that is to be blamed, but even the self-proclaimed leftist intellectuals are surprisingly very intolerant to any differences in opinions. Lack-lusture communism is busy finding refuge in caste-based identity politics. The term "secularism" in present Indian context has changed its meaning to suit the vote bank politics which means ignoring the menace of Islamic extremism. On the other end of the political spectrum, bigotry and jingoism have donned on the veil of nationalism. Those against the government are being branded "anti-nationals" in no time. The definition of nationalism has narrowed down to symbolisms of various kinds rather than any material contribution to the nation and its people. The narrow concept of "Nationalism" is a European export to India and was somewhat necessary for our struggle for Independence. But, in spirit we have always been the country of Vasudhaiva Kutumbakam (The world is our family). Ending on an optimistic note, I would like to quote Nobel Laureate Rabindranath Tagore on his vision of India:
"Where the mind is without fear and the head is held high
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake."
🇮🇳Happy Independence Day🇮🇳
Photo Courtesy: Giphy.com

Akash Kumar is the Editor-in-chief of Jeevan Mag. A first year student at the Department of Humanities and Social Sciences at the Indian Institute of Technology-Madras, he is also an alumnus of the YES Program of the US Department of State.
It's not just an occasion to celebrate but also to reflect upon where we are headed as a country. As much as it is the...
Posted by Akash Kumar on Sunday, 14 August 2016

Monday, 25 January 2016

I'm ugly and proud

Photo Credit: giphy.com
I'm ugly. No I'm not creating any drama. I'm just stating the obvious. I'm ugly. Why? Cause I don't have a 6 pack, I'm not fair, I don't have a lean physique and I'm pretty sure I have grey hair. Well ain't that the definition of 'handsome' these days? And I heard being a girl is way harder. 34-36-34 figure, a good rack, butt, long hair, manicured hands, fair, perfectly applied makeup and be prim and proper all the times. Well at least that's the definition of 'hot' that I've heard so far. Now I'm pretty sure, by now I have made you self conscious and must be checking out your body. Right? Now I'm not trying to lower your self esteem. I'm just giving you a reality check of how we perceive beauty in today's world.

Should I tell you a secret? Only 6% of the worlds population look like the definition of handsome and hot I gave above. The rest of the 94% looks just like you and me. I mean how do you actually measure someone's beauty? How can you tell that by having a perfect hour-glass figure or having 6 packs make you look sexy? I've never really understood beauty.

Now I'm not going to go real deep and tell you all that true beauty lies within. That's crap - no one really believes that. Everyone falls for a person with attractive physical features, and if your going to say you don't - then you're lying. I hate the term 'beauty' 'handsome' and 'hot' - these words make a person feel insecure. These days everyone is trying to look perfect. But for whom?

I have nothing against people who look perfect, to each their own choice. What I'm more concerned is the direction we're all heading towards. Personally I'm proud of the way I look - I don't exercise more than I need to, I never diet and I dress in the most absurd clothes you can think of. It is us that has made such a fake perception of beauty that the real meaning of beauty has been lost amidst the standard of beauty that 'media' and 'people' has set. Some people go to such length to look perfect that they starve themselves.

I just want to emphasize that the only person you should look good for is you yourself. Beauty is not physical appearance, beauty is self confidence. Physical appearance is just for what 30 or 40 years maximum, but what about after that? Your body will not remain the same forever. Will you still have your perfect figure and 6 packs when your old. The real beauty is making others awestruck of your presence and radiance and no matter how perfect you try to look - it's the inner self belief and confidence that can bring out that aura. For me beauty is very realistic. I find beauty in simple things - such as how much you respect woman, or how you treat someone younger than you or simply taking a stroll while having a hearty laugh.

And if you consider beauty to be to look perfect - then I'm happy being ugly.


This blog post is inspired by the blogging marathon hosted on IndiBlogger for the launch of the #Fantastico Zica from Tata Motors. You can apply for a test drive of the hatchback Zica today.

Friday, 11 December 2015

The "So-Called" Feminism

Feminism is being taken to a whole new level of stupidity in today's world. I, just like most of you, am a firm believer of female rights, but some so called 'feminists', or should I say 'Feminazis' have compelled me to write out my frustration.

Last year celebrities such as Beyonce, Jane Lynch and others started a world wide campaign called Banbossy.com, in order to ban the word 'bossy'. The idea behind this so called 'campaign' was that females are less interested in leadership because they are worried of being called bossy. I find that an insult to females because that just implies that they are weak to overcome the torture of a word. 

Meanwhile Iraqi parliamentarians were discussing to pass a new law LEGALIZING MARITAL RAPE and PROHIBITING WOMEN TO LEAVE THEIR HOME WITHOUT HUSBANDS' PERMISSION and legalizing 'MARRIAGE OF 9-YEAR-OLD-GIRLS' last year. Alas, feminists were too busy banning a choiced 'words' to take notice. And neither did these so called 'feminist' put any pressure of Saudi Arabia when a new law was passed that 'FEMALE DRIVERS WOULD BE CHARGED AS TERRORISTS.'


Another thing feminist's wanted to ban was 'MAN-SPREADING.' Apparently feminists didn't want men to sit with their legs spread in public transports and places. They called it a 'SPACE ISSUE.' They wanted men to sit with their legs crossed over each other. Now I may even agree to that in certain context but what's the hell does it mean to start a new hastag on twitter called #KillAllMen. 

Underscoring once again how many feminists have misappropriated the women's right movement into an excuse for hating men. And that too was okay for twitter, but when one women dared to start a hastag revolt called #WomenAgainstFeminism, feminists demanded twitter to suspend her account. Talk about comradeship. Meanwhile #ISIS was asking twitter followers on ways how they can kill and torture the captured Jordanian pilot. 

While a women was stoned to death in the Middle East for not marrying the family's choice of suitor (Honor Killing), the feminists of the free world were busy demanding that they be allowed to post pictures of their 'NIPPLES' or 'NIP-PICS' on Instagram. Meanwhile is selling females into slavery for as low as $10 but no, feminists were busy making nudity into a political movement. Yes, this is the big freedom feminists are fighting for. Talk about priorities. 

And then on Facebook, yet again 'feminists' strike. Calling and updating 'ALL MEN ARE THE SAME.' What does that even prove? 2 question:
1) Does that include your father, brother, uncle, husband and friend in that same category?
2) Did you do a survey on the 3+ billion men in this world?

Long gone are the days when feminism actually stood for something. When feminists were taking the correct stands for voting rights, women's right to buy property, demanding that females be not treated like a second class citizen. Today, feminism has become a joke and some 'feminists' are making a mockery out of feminism. Get your priorities right!

Ashneel J Prasad is  the Oceania (New Zealand/ Fiji) correspondent of JeevanMag.com A Fijian of Indian descent, Ashneel is currently a student of B.A communications at Massey University, Auckland, New Zealand.


Thursday, 29 October 2015

खिलौने देकर बहलाने की कोशिश!

सोचिए तो हंसी आती है कि देश के असाधारण साहित्यकारों एवं लेखकों को कितनी आसानी से तमन्नाओं में उलझाने और खिलौने दे कर बहलाने की कोशिश की जा रही है । साहित्यकारों के साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने और पद छोड़ने की प्रक्रिया से परेशान होकर अकादमी ने 23 अक्टूबर 2015 को अपने कार्यकारी मंडल की आपातकालीन मीटिंग बुलाई थी, इस मीटिंग में प्रोफेसर एमएम कलबुर्गी की हत्या की निंदा करने के बाद बड़ी सादगी से पुरस्कार लौटाने और पद छोड़ने वाले साहित्यकारों से अपील की गई कि वह अपने पुरस्कार वापस ले लें और अपने पदों पर आकर फिर से काम शुरू करें । 

चार घंटे चली इस बैठक में जो प्रस्ताव पारित हुआ उसमें एमएम कलबुगी के अलावा किसी और पीड़ित का नाम नहीं लिया गया । अकादमी ने केवल एक लाइन में यह कहकर दामन बचाने की कोशिश की कि "जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जी रहे नागरिकों में हो रही हिंसा की भी वह(साहित्य अकादमी) कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करती है"।
यह प्रस्ताव एक दो लेखकों को खुश तो कर सकता है परन्तु देश के ज्यादातर विद्वानों एवं साहित्यकारों का दिल नहीं जीत सकता । अबतक 40 से ज्यादा साहित्यकारों ने अपने पुरस्कार लौटाए और पद त्याग दिए हैं । और चूँकि अवार्ड लौटना साहित्यकारों का कोई सामूहिक फैसला नहीं था, इसलिए उन मे से हर एक की उत्तेजनाएं अलग अलग थीं ।
एमएम कलबुर्गी की हत्या 30 सितम्बर को हुई, तबसे अखलाक की हत्या तक 6से 8 के बीच लेखकों ने पुरस्कार वापस किए थे । फिर 28 अक्टूबर को दादरी में अख्लाक की हत्या की गई । इस हिंसा के बाद लेखकों में अवार्ड वापस करने की होड़ सी मच गई ।अतः यह कहना उचित होगा कि कलबुर्गीजी की हत्या से सम्मान लौटाकर विरोध करने की प्रक्रिया शुरू हुई थी, परन्तु इस प्रक्रिया में तूफ़ान अखलाक की हत्या के बाद आया । नयनतारा सहगल का साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटना एक तूफ़ान की आरंभ था । और सहगल ने पुरस्कार लौटाने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ खान-पान एवं पूजा-पाठ की स्वतंत्रता की वकालत की थी । इन्हीं मूल अधिकारों को लेकर बड़ी संख्या में साहित्यकरों ने विरोध प्रकट किया ।
इस सन्दर्भ में देखें तो अकादमी द्वारा पारित प्रस्ताव अधूरा मालूम होता है । प्रस्ताव में सम्पूर्ण साहित्यकारों की मंशा एवं उनके मांगों का आधा ख्याल रखा गया है । कई साहित्यकारों की उत्तेजनाओं का प्रस्ताव में ज़िक्र ही नहीं आया । इस बारे में नयनतारा सहगल का बयान आया है:" साहित्य अकादमी का जवाब देर से आया है. और प्रस्ताव देश के बड़े मुद्दों को जगह देने में नाकाम रहा है. प्रस्ताव में व्यक्ति के स्वतंत्रतापूर्वक खान-पान और पूजा-पाठ करने के मामलों एवं अधिकारों को भी शामिल किया जाना चाहिए था".हाँ ! प्रस्ताव में एक जगह समाज के विभिन्न समुदायों से एकता और समरसता बनाए रखने की गुज़ारिश की गई है.किन्तु सहगल इन दुर्घटनाओं के लिए समुदाय को ज़िम्मेदार नहीं मानती हैं । उन्हों ने कहा :" मेरे विचार में यह सही नहीं है. कोई समुदाय चिंता का कारण नहीं बन रहा है. बल्कि तथाकथित हिंदुत्व विचारधाराओं के मानने वाले बीजेपी और कुछ छोटे दलों के अराजक तत्व लोगों पर हमला कर रहे हैं " ।
प्रस्ताव में इतनी सारी कमियों के बावजूद अकादमी ने साहित्यकारों से पुरस्कार एवं पद वापस लेने की अपील की है । प्रश्न उठता है कि अकादमी के इस निवेदन पर साहित्यकारों की प्रक्रिया क्या होगी?क्या साहित्यकारों का आक्रोश केवल एक एमएम कलबुर्गी की हत्या से जुड़ा हुआ था? साहित्य अकादमी द्वारा कलबुर्गी के क़त्ल की निंदा और हत्यारों के खिलाफ कार्रवाही की मांग अवार्ड लौटाने वाले साहित्यकारों की आखिरी मंजिल साबित होगी? उत्तर मालूम है नहीं । उनकी मांगें सीमित नहीं थी । उनके इस विरोध में उन घट्नाओं का भी बड़ा योगदान था जिनका ज़िक्र प्रस्ताव में नहीं किया गया । इस के बावजूद साहित्य अकादमी साहित्यकारों को किस मुंह से अवार्ड वापस लेने की बात कह रही है । उसके आचरण को देखकर अहमद फ़राज़ की लाइन याद आती है ।
"अपनी आशुफ्ता मेज़ाजी पे हंसी आती है''
मेरी राय है कि साहित्य अकादमी फिलहाल साहित्यकारों को पुरस्कार वापस देनें की चिंता छोड़ कर उनकी मांगों पर ध्यान केन्द्रित करे । सम्पूर्ण लेखकों की मांगों को प्रस्ताव में शामिल करे और उन्हें पूरा करने के लिए सरकार पर दबाव बनाए । 


हसन अकरम जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उर्दू विभाग के छात्र हैं।

Monday, 12 October 2015

एक कसक दिल की दिल में दबी रह गई... -हसन अकरम

आज से चार पांच वर्ष पहले जब एक मित्र ने मुझे यह बताया था, कि जावेद इकबाल जीवित हैं तो मुझे यक़ीन नहीं आया था मैंने उससे कई बार प्रश्न किया था:"किया वही जवेद इकबाल' जो शायर-ए-मशरिक़ के पुत्र हैं ? जावेद इकबाल के नाम से मुझे वह घड़ी याद आ गई जब छठी कक्षा में कमर-ए-आलम सर ने इकबाल की एक कविता जिसका शीर्षक "जावेद के नाम " है' सुनाई थीऔर इसकी पृष्ठभूमि बताते हुए कहा था कि यह कविता अल्लामा इकबाल ने अपने इसी पुत्र जावेद इकबाल के लिए लिखी थी। 






इस याद के साथ जब मैंने जावेद इकबाल के जिंदा होने की बात सुनी तो दिल में एक हुल्बुलाहट सी होने लगी मेरा दिल कहने लगा मुझे उस हस्ती से अवश्य मिलना चाहिए तब मैंने सोचा था, कि मैं जावेद इकबाल से ज़रूर मुलाक़ात करूंगा मैं उस हस्ती से मिलूँगा जिसके शरीर में इकबाल का लहू दौड़ता है मैं उस व्यक्ति से मिलूँगा जिसे इकबाल ने अपनी कोशिशों के द्वारा महानता के इकबाल तक पहुँचाया था मैं उससे मिलकर उन हाथों को चूम लूँगा, जिन पर शायर-ए-मशरिक़ के स्पर्श मौजूद हैंमेरी आँखों को उस बेटे का दीदार हो जाएगा जिससे इकबाल की यादें जुड़ी हैं किन्तु यह सब सोचने के कुछ ही छणों बाद मुझे एहसास हुआ था, कि 62 साल पूर्व के बटवारे में इकबाल पाकिस्तान के हिस्से में चले गए थे, इसलिए आज भी उनका परिवार पाकिस्तान में निवास करता है अतः जावेद इकबाल से मिलने के लिए मुझे संयुक्त विरासतें रखने वाली भूमि के बीच खड़ी की गई सीमा को पार करना होगा एवं इसको पार करने के लिए मुझे पासपोर्ट और वीजा प्राप्त करने होंगे, जिसका खर्च सहन करने की क्षमता मुझ में नहीं थीतब फिर मैंने सोचा था कि जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो जाऊंगा और कुछ धन इकट्ठा करलूँगा तो पासपोर्ट एवं वीज़ा प्राप्त करके अपने महबूब जावेद इकबाल से मिलने जाऊंगा परन्तु मेरे इस कल्पना के पूरा होने का प्रकृति ने इंतजार नहीं किया.और इसी 3 अगस्त को उनके देहान्त के साथ ही मेरा सपना अधूरा रह गया




हसन अकरम

उर्दू विभाग,जामिया मिलिया इस्लामिया

Friday, 9 October 2015

शरद ऋतु का आगमन (फ़ीचर) -अबुज़ैद अंसारी

अक्टूबर माह की शुरुआत हो गई, दिन एक - एक कर के गुज़र रहा है, साथ ही मौसम करवटें ले रहा है। अब शाम दूसरी ऋतुओं की तुलना में जल्दी होती है। रात के आखरी पहर में हल्की - हल्की ठंडक चादर ओढ़ने और पंखा बंद करने पर मजबूर करती है। मौसम के आने की इस आहट से लगता है कि अब अधिक दिन नहीं बचे शरद ऋतू के आने में, हर प्रकार के मौसम में अलग ही आकर्षण होता है चाहे सर्दी हो या गर्मी या बसंत या बरसात सब अपने आप में सुन्दर, आकर्षण और बहुत ही अलौकिक हैं जो इस धरती पर फैली समस्त प्राकृतिक को खुद में समेट कर अपने रंग में रंगने में सक्षम हैं। सर्दियों के मौसम आते ही तापमान घट जाता है, लोगों की वेशभूषा बदल जाती है, वहीं गर्मी की चिलचिलाती धूप गुनगुनी और आनंदमय लगने लगती है। ओंस की बूंदे पेड़ - पौधों के पत्तों पर बिखर कर मोतियों सी प्रतीत होती हैं। दूर कहीं ऊंचे -ऊंचे पर्वत बर्फ की मोटी-मोटी परतों से ढक कर भोर में सूर्य की किरणों से चाँदी की तरह चमकते हैं।


Photo credit: adirondack-park.net
मैदानी इलाक़ों में फैले बड़े - बड़े मैदान जो ज़मीन को आसमान से मिलाने की क्षमता रखते हैं उनका क्षितिज भी धुंध से धुंधला पड़ जाता है। मगर उन मैदानों पर गेंहूँ की बालियाँ सूर्य प्रकाश में सोने सी चमकती हैं। प्रवासी पक्षियों का आवागमन शुरू हो जाता है, वन हो या छोटा या बाग़, हमें अलग अलग प्रकार की पक्षियों के देखने और उनकी सुरीली ध्वनि सुनने का अच्छा अवसर मिलता है। प्राकर्तिक के आँगन में शरद मौसम की इस बहार से सुंदरता और भी बढ़ जाती है। गुलाब, गुलदाउदी, नरगिस ना जाने कितने अलग - अलग प्रकार के पुष्प दूर दूर तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं। शरद ऋतु की सामाजिक और धार्मिक महत्वता प्राकर्तिक महत्वता से कम नहीं है। यही तो वह मौसम है जिसमे व्रत उपवास, त्यौहार, तीर्थ, पूजा, समाहित है। यह ख़ुशी उल्लास और उमंग का मौसम है। जहाँ इस मौसम में ख़रीफ़ की कटाई होती है वही दूसरी ओर दिन रात काम करने वाला देश का अन्नदाता किसान रबी की फ़सल बोने की तैयारी करता है। वाणिज्य और व्यापार के लिए सबसे अनुकूल मौसम, अधिकतर विवाह भी इसी मौसम में होते हैं इस प्रकार से शुभ आयोजन, स्वच्छता आदि से इस मौसम का गहरा संबंध है। इस तरह शरद ऋतु अपने सौंदर्य के साथ श्रृंगार करने में सक्षम है। इसके आगमन से प्रकृति का मिजाज़ तो बदलता ही है , हमारे अपने रीति - रिवाज, संस्कार, पहनावा रहन - सहन में भी कई महत्वपूर्ण बदलाव आ जाते हैं।

-अबुज़ैद अंसारी

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक हैं, और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं। 




Thursday, 30 July 2015

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम : हमारे सच्चे मार्गदर्शक को श्रद्धांजलि -अबुज़ैद अंसारी


बहुत देर से कई घंटों तक क़लम हाथ में लिए बैठा रहा, सोचता रहा क्या लिखूं, हज़ारों लाखों शब्द दिमाग़ से हृदय - हृदय से दिमाग़ की ओर दौड़ते रहे। मैने आज अपने जीवन में ऐसी ख़ामोशी का एहसास किया जिसकी मैने कभी कल्पना भी नहीं की थी। ऐसी ख़ामोशी जिसमे अपने हृदय के चीख़ - चीख़ कर रो देने की आवाज़ प्रतीत की की, एक पल के लिए रगों में दौड़ता हुआ ख़ून ठंडा सा होता प्रतीत हुआ, इस पल में लगा जैसे धरती पैरों से खिसकी नहीं खिसका दी गई हो। ये वो पल था जब मेरी छोटी बहन ने दौड़ते हुए आकर मुझे समाचार दिया

"भारत के पूर्व राष्ट्रपति काका कलाम नहीं रहे"

ये मेरे लिए बहुत मुश्किल समय था कि मैं खुद को इस बात पर विश्वास दिला सकूँ, बार बार हृदय से यही प्रशन उठते 'क्या ये सच है? या महज़ एक सपना? 26 जुलाई की रात मैं पिताश्री से उनकी ही चर्चा कर रहा था और 27 जुलाई को ये सब हो गया। आज का दिन तो और दिनों की ही तरह था, देखने पर कोई बदलाव तो प्रतीत नहीं हो रहा था, मगर सोचनें पर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सब कुछ बदल गया हो, मैं उलझन में पड़ गया था कोई शब्द ही नहीं थे कि किसी से कुछ कहूँ या खुद से कुछ कह सकूँ, मैने घर से बाहर निकल कर सड़कों पर दौड़ लगा दी, जिधर गया जिधर से निकला मातम सा छाया हुआ था। लोगों के चेहरों पर एक अजीब थी, कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा था। हर तरफ़ बस एक ख़ामोशी थी। इन उदास और ख़ामोश चेहरों के पीछे मैं रोते हुए चेहरों को साफ़ - साफ़ देख सकता था। ये हाल सिर्फ़ मेरे शहरवासियों का ही नहीं बल्कि हर उस भारतवासी का था।

कलाम जिनके लिए एक मार्गदर्शक थे। उनको प्यार करने वाला ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जिसकी आँखें आज नम ना हुई हों, मैं स्वयं रोया था , मगर ये सोच कर आँसू छुपा लिए कि कहीं कोई देख ना ले, सारा देश आज शोकाकुल है। आज भारत माँ ने अपना सच्चा सपूत खोया है। आज हम सब ने ऐसे व्यक्ति को खो दिया जो कभी अपने लिए नहीं जिया, बल्कि लोगों के लिए जिया। उनके चले जाने से हम सब के बीच एक ख़ालीपन सा महसूस हो रहा है, जिसकी भरपाई शायद ही हम कभी कर सकें।



Photo Credit: indianexpress.com


कलाम साहब बहुत साधारण से व्यक्ति थे , मगर उनका व्यक्तित्व असाधारण था। विशेषरूप से युवा पीढ़ी और बच्चों के वो सच्चे मार्गदर्शक थे। उनका जीवन एक मिशन था, उन्होने अपने जीवन को कई अलग -अलग भूमिकाओं में एक साथ जिया, एक लेखक के रूप में, एक कवि, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, विचारक और वे इन सभी भूमिकाओं में खरे थे। एक आम ग़रीब छोटे से परिवार होने के बावजूद भी उन्होंने कामयाबी के कई बड़े आयामों को तय किया और स्वयं को सिद्ध कर आसमान से भी ऊँची बुलंदियों को छुआ। वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जो अपनी प्रतिभा के बल पर भारत के राष्ट्रपति बने। अपनी दूरदृष्टि से उन्होने अपने सपनों का नहीं भविष्य का भारत देखा था। "मिशन 2020" इसका सबसे उपयुक्त उदहारण है। हम सब देशवासियों को इस भविष्य के भारत को भविष्य में नज़र आने जैसा बनाने के लिए "मिशन 2020" से जुड़ जाना चाहिए और इसे सच करने के लिए कलाम साहब के बताए सिद्धांतों पर चलना चाहिए। मेरी दृष्टि से यही डॉ कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
वो चमकता हुआ हीरा थे। जिसकी चमक भारत ही नहीं बल्कि सारे विश्व में फ़ैली, जो आज भी क़ायम है। वो हीरा हमने ज़रूर खो दिया मगर उसकी दी हुई चमक हमारे आस - पास आज भी बाक़ी है। क्यों ना हम सब इस चमक से लबरेज़ हो जाएं। 

-अबुज़ैद अंसारी 

अबुज़ैद अंसारी जामिया मिल्लिया इस्लामिया (नई दिल्ली) जनसंचार मीडिया / पत्रकारिता के छात्र हैं। आप जीवनमैग के सह -संपादक हैं, और नवाबों के शहर लखनऊ से ताल्लुक़ रखते हैं। 




Sunday, 28 June 2015

बदलते बर्मा में राह तलाशता चीन

हाल ही में बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता और नोबेल (शांति) विजेता आंग सान सू की ने चीन की राजनीतिक यात्रा की है. चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के आमंत्रण पर यह उनकी पहली चीनी यात्रा थी. इस पाँच दिवसीय (दस से चौदह जून) यात्रा ने वैश्विक मीडिया में खूब सुर्खियाँ बटोरी.

गौरतलब है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सू की से मुलाक़ात करने के लिए प्रोटोकॉल तोड़कर उनका स्वागत किया. कुछ वर्षों पूर्व तक यही चीन बर्मा में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाली सू की की नज़रबंदी का हिमायती था. वहीं दूसरी ओर चीन में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले नोबेल (शांति) विजेता लेखक लू श्याबाओ आज भी एक कैदी का जीवन जीने को बाध्य हैं. उन्हें रिहा करने की पश्चिमी देशों की अपील को चीन बार-बार ठुकराता रहा है. सू की का बर्मा में वही स्थान रहा है जो चीन में लू का है. जाहिर है चीन अपने राजनीतिक और सामरिक हितों को साधने के लिए किसी भी वैश्विक विचारधारा और राजनीतिक हस्ती (सत्ताधारी या गैर-सत्ताधारी) से हाथ मिला सकता है. चीनी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने अपने संपादकीय में लिखा- “दुनिया इस भ्रम में न रहे कि बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना की पहल से दोनों देशों के रिश्तों में कमी आई है. दोनों देश पारस्परिक साझेदारी से क्षेत्रीय विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं.” दूसरे नज़रिए से देखें तो पहले से ठीक विपरीत आज चीन औचित्यपूर्ण उदारवादी सोच की ओर अग्रसर हो रहा है. लेकिन इस पर भरोसा करना असहज है और खासकर भारत के लिए तो मुश्किल भी.

चीन बर्मा में सैन्य शासन का पुरज़ोर समर्थक रहा है. लेकिन फिलहाल बर्मा की सेमी-सिविलियन सरकार के काल में दोनों देशों के संबंध कमजोर हुए हैं. जनता के भारी विरोध के बाद थेन सेन सरकार ने चीन की तीन महत्वाकांक्षी मूलभूत ढांचा विकास परियोजनाओं- लेप्टाडाँग तांबा खदान, मित्सोने पनबिजली बाँध और रक्खिने (बर्मा)- कुनमिंग (चीन) रेलमार्ग विकास परियोजना को रद्द कर दिया था. जिससे बर्मा में चीनी निवेश पिछले 4 वर्षों में 8 अरब डॉलर (2011 में) से घट कर महज 50 करोड़ डॉलर (2015 में) रहा गया है. इससे बर्मा में चीन के बढ़ते प्रभाव को जबरदस्त झटका लगा है. वहीं चीन बीते चार महीनों से बर्मा सीमा पर कोकांग क्षेत्र में हो रहे जातीय विद्रोह और पनपते उग्रवाद से भी परेशान है.
सू की से मुलाक़ात में चीनी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने उन्हें अपने पक्ष में करने की भरसक कोशिश की है. म्यांमार में इस साल के अंत तक आम चुनाव होने हैं. संभव है, इसमें सू की के नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी को बहुमत प्राप्त हो. चीन इस संभावित जीत में अभी से ही अपनी संभावनाओं की तलाश कर रहा है. वह बर्मा के लोगों का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए सू की की लोकप्रियता का सहारा लेना चाहता है.

दूसरी तरफ बर्मा में सैन्य शासन की स्थापना (1962-63) से ही भारत और बर्मा के रिश्तों में ठहराव आ गया. 1993 के बाद पीवी नरसिंहाराव और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के प्रयासों से म्यांमार की चीन पर निर्भरता घटी और बाकी दुनिया से अलगाव भी कम हुआ. वहीं विश्व के सबसे विशाल लोकतंत्र भारत ने कभी सू की और उनकी पार्टी के लोकतांत्रिक संघर्ष का भी मुखर रूप से समर्थन भी नहीं किया. सू की का भारत से बस इतना रिश्ता है कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं. क्या इस रिश्ते को कूटनीतिक मोड़ नहीं दिया जा सकता

बीते सप्ताह भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश सचिव एस जयशंकर ने म्यांमार की यात्रा की. यह दौरा भारत के पक्ष में नहीं रहा. बर्मा ने दो टूक शब्दों में भविष्य में एनएससीएन (नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड) के खिलाफ़ किसी भी सैन्य अभियान में भारत का सहयोग देने से इनकार कर दिया है. क्या यह इसी महीने हुए भारतीय सैन्य अभियान पर सरकार द्वारा ढिंढोरा पीटने का परिणाम है? या इसके पीछे बर्मा सरकार की कुछ और मजबूरियां हैं? बर्मा सरकार का कहना है कि चरमपंथियों के खिलाफ अभियान से उनके देश के भीतरी इलाकों में घुस आने का डर है. क्या यह सच और वाजिब है?

चीन अभी से ही भावी लोकतांत्रिक म्यांमार में अपनी संभावनाएं तलाश रहा है. वह बर्मा से हिन्द महासागर में सीधे प्रवेश का रास्ता ढूंढ रहा है. चीन धीरे-धीरे भारत को पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण में श्रीलंका और पूर्व में म्यांमार की मदद से घेरने की कोशिश में सफल भी हो रहा है. ऐसे में हमें भी शीघ्र ही अपना रास्ता ढूंढ लेना चाहिए.   
नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं।

Tuesday, 26 May 2015

ई हs विज्ञापन के दुनिया, तू देख बबुआ

सुप्रीम कोर्ट ने जनता के पैसे से मीडिया में नेताओं के फोटो वाले विज्ञापन प्रसारित व प्रकाशित करने पर रोक लगा दी है. हालाँकि मोदी जी को इसकी छूट होगी. वह देश के प्रधानमंत्री हैं. प्रतियोगिता-परीक्षा के लिए सामान्य ज्ञान में वृद्धि हेतु जानना लाभप्रद रहेगा कि यह छूट राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी प्राप्त होगी.

कुछ मुख्यमंत्रियों को इस नियम से आपत्ति है. अरविंद इनमें नहीं हैं. उनके विज्ञापन एफ़एम पर आते हैं. रेडियो में तस्वीर की झंझट होती ही कहाँ है. विज्ञापन जितना लम्बा चाहो बजवा लो. वैसे, आजकल के चौबीस गुना सात एफएम चैनलों से केवल विज्ञापनों के ही तो कार्यक्रम आते हैं. हाँ, बीच-बीच में ब्रेक के तौर पर कुछ गाने बजा दिए जाते हैं. शेष समय मुर्गा-गधा-उल्लू इत्यादि बनाने में व्यतीत होता है. खैर, एफएम चैनलों पर असंतुष्ट नेताओं के लिए अपार संभावनाएं हैं.



अपने इलाके में एक पहुंचा हुआ रीमिक्सिया कलाकार है. पुराने गीतों में नए शब्द भरकर नित नव गीत रचते-गाते रहता है. लेकिन है वह समय के साथ चलने वाला. आज सुबह से ही तान छेड़ रखा है, “ई हs विज्ञापन के दुनिया, तू देख बबुआ.”

ऑटो- मेट्रो, अख़बार-टीवी, सिनेमा-खेल, कप-प्लेट, घर-दीवार, टी-शर्ट वगैरह... सर्वत्र विज्ञापन का ही राज है. जहाँ देखो वहीं विज्ञापन. थोड़ी सी स्पेस दिखी नहीं कि विज्ञापन ठूंस दिया. उसका सुझाव था, आप में योगेन्द्र- प्रशांत आदि के ब्रेक-अप से उत्पन्न रिक्त स्थान को भी विज्ञापनों से ही भर दिया जाए. संभव है, इससे पार्टी का अंतः कलह और क्लेश मिट जाए. विज्ञापन ‘नाशै रोग हरे सब पीरा’ है.

विज्ञापन के लिए ब्रेक चाहिए. ब्रेक का जीवन में बड़ा महत्व है. तथाकथित छोटे से ब्रेक के बाद ही तो बड़ी खबर आती है. बिना ब्रेक गिरने का डर रहता है, बाज़ार में गिरने का. ब्रेक के लिए ब्रेकर चाहिए, रोकड़ चाहिए. और इन सब के लिए कोई प्रायोजक चाहिए यानी स्पोंसर.

इस दौर में हर व्यक्ति, घटना, वस्तु, स्थान इत्यादि प्रायोजित हैं. सबका अपना-अपना स्पोंसर है. सब की स्पोंसरशिप होती है. पार्टी, नेता, जनता, वोटर सब स्पोंसर्ड हैं. स्पोंसरशिप ख़त्म, पार्टी चेंज. आम चुनाव एक लोकप्रिय विज्ञापन-प्रचार स्पर्धा है. जो विज्ञापन कला में निपुण होगा उसकी जीत होगी.

आज हर घटना प्रायोजित है. कॉलेज फंक्शन से लेकर विश्व भ्रमण तक के स्पोंसर हैं. हमारा आपका जीवन भी प्रायोजित है. जन्म, मृत्यु, विवाह इत्यादि सभी के प्रायोजक हैं. दहेज़ भी एक तरह की स्पोंसरशिप ही है. आज प्रेम भी स्पोंसर्ड परिघटना है. बिना प्रायोजक प्रेम असंभव है. प्रेम के लिए बज़ट चाहिए. पैसा खत्म, प्यार ख़त्म. जेब खाली कि बाय-बाय. यहाँ प्रेम की पराजय है. नगद नारायण की जय है.

एक तरफ दहेज़, हत्या, आतंकवाद, दंगा तो दूसरी ओर पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार सब प्रायोजित हैं. सब सौदा है. सबके स्पोंसर हैं. बीते दिनों नीतीश की सभा में दस-बारह साल के लड़के का प्रतिभाशाली भाषण हुआ. लोग शक कर रहे हैं, कहीं वह भी स्पोंसर्ड तो नहीं? क्या करियेगा, कुछ तो लोग करेंगे, लोगों का काम है शक करना- गायक गा रहा है.

और खेल? खेल तो पूर्णतः विज्ञापन का ही एक उपक्रम है. मसलन क्रिकेट की प्रत्येक गेंद, रन, ओवर, विकेट, टीम इत्यादि के स्पोंसर होते हैं. अब तो हार-जीत भी स्पोंसर्ड आने लगी है.

विद्वत जनों के अनुसार विज्ञापन ने मीडिया को खोखला कर दिया है. रेडियो, टीवी और अख़बार के बाद अब सोशल मीडिया भी इसकी गिरफ़्त में है. यहाँ अभी तक तो सब अपना ही विज्ञापन करने में व्यस्त हैं. लेकिन वह रात दूर नहीं जब अधिक फैन फोलोविंग वाले लोग अपनी-अपनी वाल पर मल्टी-नेशनल कंपनियों के विज्ञापन का पोस्ट डालना शुरू कर दें. कवि-कलाकार आदि अपने शो की टिकट बिक्री हेतु इस युक्ति का सदुपयोग कर ही रहे हैं. वहीं फेसबुक पोस्ट के मध्य में ब्रेक डालने पर विचार-मंथन जारी है. इन ब्रेक को विज्ञापन से भरा जा सकता है. परंपरानुसार किसी राजनेता से ही इस परियोजना के उद्घाटन की प्रतीक्षा है.


विज्ञापन एक कला है. फेंकने की कला. समेटने की कला. इसमें जीत है, पैसा है. इसमें सभी अलंकार हैं, रस हैं. छंद, लय, तुक, गति-यति, सौन्दर्य सब है. इसमें साहित्य है. समाज है. किन्तु विज्ञापन है तो मेकअप ही. बिना छपे- बिना दिखे मेकअप का क्या फ़ायदा? रीमिक्सिया बाबू गा रहा है- ई हs विज्ञापन के दुनिया तू देख बबुआ... एकाएक लय-सुर पलटता है और वह संजीदगी से गाता आगे निकल जाता है- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...  

नन्दलाल मिश्र जीवन मैग के प्रबंध संपादक हैं। सम्प्रति आप दिल्ली विश्वविद्यालय के संकुल नवप्रवर्तन केन्द्र में मानविकी स्नातक के छात्र तथा दिल्ली विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम समन्वयक है। आप बिहार के समस्तीपुर से ताल्लुक रखते हैं। 

A series of skype group conversations beetween students from India & Pakistan

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